Posted by: ramadwivedi | जनवरी 11, 2009

दहलीज पर कुछ क्षणिकाएँ

१- दहलीज तक मेरी,
वे आए जरूर थे,
पर जाने क्या हुआ,
रास्ते बदल गए।

२- हम सिसकियाँ भरते रहे,
दहलीज के इस पार,
आँखों में अश्रु लेके,
वे भी चले गए।

३- दहलीज-ए- दायरा,
कुछ इतना बड़ा हुआ,
ताउम्र कैद बन रहे,
उनके इन्तज़ार में।

४- दहलीज के इस पार,
वे भी न आ सके,
हम लांघ कर दहलीज को,
न जा सके उस पार।

डा.रमा द्विवेदी
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Responses

  1. Ramaji

    Very nice short poems.
    -Harshad Jangla
    Atlanta, USA

  2. प्रथम तो अनुभूति कलश में आपका स्वागत है हर्शद जी….रचना अच्छी लगी ..हार्दिक आभार… यदि समय हो तो दहलीज पर अन्य रचनाएं भी देखियेगा। अपने विचारों से अवगत करवाते रहियेगा।

    डा.रमा द्विवेदी

  3. रचना अच्छी लगी .. आभार.

  4. Bahut- bahut haardik aabhaar Mahendra jee.

  5. Dahleeg a lakeer hai na kanto ka taar hai,
    per paar karna itna mushkil jaisey cheen kee dewar hai

    dahlej per hee intzaar hai

    bahoot sunder
    Bahoot bahoot badahai
    Vj


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