Posted by: ramadwivedi | जनवरी 22, 2009

शून्य की यात्रा

शून्य! जीवन- यात्रा का आरंभ,
जन्म जीवन का अवतरण,
न भाषा,न सामर्थ्य,
चलना, बोलना सब शून्य,
माँ का दुग्ध-पान,
तन-मन की शक्ति की वृद्धि,
माँ की उंगली का सहारा,
शिशु के शून्य से जुड़ जाता है जब,
चलने का सामर्थ्य विस्तार पाता है तब।
शिशु का नि:शब्द शून्य,
जब माँ की तोतली भाषा से,
जुड़ जाता है तब,
उसका शब्द ज्ञान,
वटवृक्ष सा सघन-गहन बन,
दूसरों के शून्य को,
अंकों में बदलने की सामर्थ्य,
पा जाता है,
शून्य से शून्य तक की यात्रा,
कभी न समाप्त होने की यात्रा,
जीवन जब भी जटिल-कठिन लगे,
शून्य में खो जाओ,
शून्य से फिर आरंभ करो,
जीवन को नई ऊर्जा,
नई स्फूर्ति का अहसास,
यह अहसास ही ,
शून्य को अंकों में बदल देता है,
और फिर चरम बिन्दु को पाकर,
फिर शून्य में बदल जाता है,
जीवन का शून्य मृत्यु,
मृत्यु का शून्य जन्म।

डा.रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

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Responses

  1. शून्य को अंकों में बदल देता है,
    और फिर चरम बिन्दु को पाकर,
    फिर शून्य में बदल जाता है,
    जीवन का शून्य मृत्यु,
    मृत्यु का शून्य जन्म।
    बहुत सुंदर…

  2. Waah ! Waah ! Waah !

    Yatharth prastut karti ,Bahut hi sundar rachna……Bhaav,Shabd,Vinyaas…sab ati sundar…

  3. sukhad yaatra !

  4. बेहतरीन! क्या बात है!

    कैसी हैं आप..आजकल मैं भारत में ही हूँ.

  5. बहुत सारगर्भित रचना. आपका आभार.

  6. संगीता जी,रंजना जी, विनय जी,समीर जी एवं हिमांशु जी,

    आप सभी ने अपने अमूल्य विचारों से अवगत करवाया इसके लिए तहे दिल से शुक्रिया।

    डा.रमा द्विवेदी


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