Posted by: ramadwivedi | मार्च 12, 2009

प्यासा अजनबी (कहानी)

यूं तो हर जुमेरात को रौशनी से नहाया दुबई शहर की सज-धज काबिले तारीफ़ होती है किन्तु दिसम्बर के महीने में जब ‘वर्ल्ड शापिंग फेस्टीवेल’ होता है तब नगर को दुल्हन की तरह सजा दिया जाता है। हर तरफ धूम-धाम और लोगों का हुजूम ही नजर आता है। दुनिया भर से लाखों-लाखों लोग शापिंग करने और मनोरंजन के लिए यहां पर आते हैं । हर तरफ ट्राफिक जाम । शापिंग सेन्टर्स, नाइट-क्लब, डिस्कोबार, टैक्सी स्टैंड़ और बस स्टैंड़ हर जगह आदमी पर आदमी ठेलम-ठेल होती है । यहां तक की घुसलखाने जाने के लिए भी बहुत लंबी लाइन दिखाई देती है । हर तरह के लोग व्यवसाय करके पैसा कमाने यहां आते हैं । यहां तक की लोग पैसे के बल पर हर वो वस्तु भी खरीद सकते हैं जिसे वे अन्य मुस्लिम देशों में किसी कीमत पर भी नही पा सकते क्योंकि दुबई में देह व्यापार भी बहुतायत में होता हैं ।
मैं भी इसी समय हर वर्ष छुट्टियां बिताने के लिए यहां ही जाता हूं क्योंकि मेरे कार्यस्थल से यही स्थान बहुत कम दूरी पर है और यहां पूरी स्वतंत्रता से घूम-फिर सकते हैं न कोइ रोक-टोक न किसी तरह का सामाजिक या कानूनी भय। मेरा फ्लैट भी यहीं बन रहा है इसलिए भी एक बार उसे देखने आना ही पड़ता है । मै जिस अपार्टमेंट में रुका था उसी में एक पाकिस्तानी लघुपरिवार भी आकर रुकता है। ये लोग भी ‘वर्ल्ड शापिंग फेस्टीवेल’ में छुट्टियां मनाने के लिए आए हुए हैं। मेरे फ्लैट के ठीक सामने वाले फ्लैट में वे लोग ठहरते हैं। इस परिवार में एक मर्द,एक जवान औरत, एक अधेड़ उम्र की औरत है जो इनकी मां होगी और लगभग ड़ेढ़ दो साल का एक बच्चा है।
एक दिन बच्चा खेलते -खेलते मेरे फ्लैट में आ जाता है उसके पीछे-पीछे उसकी दादी भी आ जाती है और उसे लेकर चल देती है बच्चा खेलने के लिए मचलता है और रोने लगता है तब मुझसे रहा नहीं जाता और मैं उनसे आग्रह करता हूं कि थोड़ी देर उसे यहीं खेलने दें। बच्चे उसे अच्छे लगते हैं वैसे भी बच्चा खेलने के लिए मचल रहा था । दादी की गोद से मुक्त होने की पुरजोर कोशिश कर रहा था और बंधन मुक्त होकर कुछ अपनी मनमानी करना चाह रहा था। मेरे बार-बार आग्रह पर वह बच्चे को खेलने के लिए छोड़ देती है और खुद भी मेरे पास बैठ जाती है । मैं उनका हाल-चाल जानने केलिए पूछने लगता हूं,‘ आप लोग कहां से आए है?’
‘तब वह मुझे बताती हैं कि वे इस्लामाबाद से आए हैं। उसका नाम यसमीन है। साथ में उनका बेटा-बहू और यह उनका पौत्र है’।
‘उसने मेरे बारे में भी जानना चाहा तब मैंने उसे बताया कि मेरा नाम जय है और मैं रियाद में रहता हूं। छुट्टियां मनाने यहां आया हूं ’।
‘ यसमीन ने पूछा कि क्या आप अकेले हैं? आपका परिवार ’?
‘मैंने कहा मैं अकेला ही हूं और पत्नी से मेरा तलाक हो गया है’।
‘उसने कहा यह जान कर दुख हुआ कि आपका तलाक हो गया है । यदि आप बुरा न माने तो एक बात पूछूं’।
‘मैंने कहा हां जरूर पूछिए’।
‘उसने कहा कि आपका तलाक क्यों हुआ’?
‘मैंने उसे यूं ही टालने के उद्देश्य से बताया कि हमारी नहीं बनी इसलिए तलाक ले लिया। यह कहकर मैं उसके चेहरे के हाव-भाव देखने लगा कि मेरी बात की क्या प्रतिक्रिया होती है या मेरे बारे में वह क्या सोचती है’? किन्तु उसका चेहरा देखकर यह पता लगाना मुश्किल हो गया कि वह मेरे बारे में क्या सोच रही है? उसके चेहरे पर एक तटस्थ भाव था । थोड़ी देर में वह बच्चे को लेकर चली गई। अगले दिन वह फिर लाबी में आई और बोली बच्चा रो रहा है आप जरा इसके लिए चाकलेट ला दीजिए । मैंने चाकलेट लाकर बच्चे को दी तो बच्चा बड़ा खुश हो गया और दादी की गोद छोड़ कर खेलने लगा । हम दोंनो भी लाबी में बैठ गए और मैं जाकर दो गर्मागर्म काफी ले आया । बातचीत का सिलसिला फिर शुरू हुआ । पहले दिन की बातचीत से वह आज ज्यादा सहज महसूस कर रही थी। बातों बातों में उसने मुझे बताया कि पांच वर्ष पहले उनके सौहर गुजर गए हैं । बस यही एक बेटा- बहू और यह मेरा पौत्र है। सौहर के जाने के बाद ज़िन्दगी ठहर सी गई है। मन बड़ा उदास रहता है और किसी काम में दिल नहीं लगता लेकिन फिर भी ज़िन्दगी तो जीनी ही है।
मैंने सहानुभूति दर्शाते हुए कहा- आपका दर्द मैं समझ सकता हूं । औरत का दर्द पुरुष की अपेक्षा अधिक होता है । हिम्मत रखिए अब खुदा की मर्ज़ी यही है तब हम क्या कर सकते हैं?
यसमीन ने मुझसे कई बार यह सवाल पूछा कि हमारा तलाक क्यों हुआ ?
अब तक मैं यसमीन से काफी घुल-मिल गया था इसलिए मैंने सोचा कि अब अपनी राम-कहानी बताने में कोई हर्ज़ नहीं हैं ।
मैंने एक लंबी सांस लेते हुए उसे अपनी आप बीती पूरी ईमानदारी से बताई।
मैंने उसे बताया कि उनकी शादी कैसे टूट गई । यसमीन के बार-बार पूछने पर जय ने बताया कि वह हमेशा मुस्लिम देश में ही नौकरी के सिलसिले में रहा। जहां किसी तरह का सामाजिक अपराध क्षम्य नहीं माना जाता । खासकर किसी परायी स्त्री को देखने तक का गुनाह भी नहीं किया जा सकता । प्रेम यहां पाप है और हर जुमेरात किसी न किसी का सर कलम कर दिया जाता है। मैं हमेशा संयम से रहा और शादी भी मैंने पैंतीस वर्ष की आयु में की । माता-पिता की पसन्द से शादी कर ली । मेरी पत्नी मेरे पिता जी के बचपन के दोस्त की बेटी थी । इसलिए मैंने ज्यादा कुछ जानने की कोशिश नहीं की । तब मुझे क्या पता था कि स्कूल में अध्यापिका होने के बावजूद वह इतने दकियानूसी विचारोंवाली होगी?
शादी के बाद हम हनीमून के लिए कोडाइकोनाल गए जब हम होटल पहुंचे बहुत थक गए थे इसलिए जाते ही हम सो गए। दिनभर हम सोये रहे। जब खुली खिड़की से ठंडी-ठंडी हवा बदन को लगी तब मैं उठा और खिडकी को बंद किया तब खिड़की बन्द करने से जो आवाज हुई उससे लीना डर कर चोर-चोर कहकर चिल्लाने लगी। मैंने उसे प्यार से छुआ कि वह और चिल्लाने लगी चोर-चोर। जैसे मैं उसे ब्याहकर नहीं भगाकर लाया हूं। मैंने जल्दी से कमरे की बत्ती जला दी। तब कहीं जाकर वह चुप हुई किन्तु बड़ी डरी-सहमी सी लगी। तीस वर्ष की उम्र कोई कम तो नहीं होती यह सब समझने के लिए। वह शारीरिक संसर्ग को घृणा की दृष्टि से देखती । उसे इस सब में कोई रुचि नहीं थी। मैंने क्या-क्या सोचा था सब सपने एक ही मिनट में चूर-चूर हो गए। जैसे -तैसे उसे समझाने की कोशिश की। वह मान तो गई पर दिल से नहीं यह मैं जानता था। बस कैसे तो विवाहित ज़िन्दगी की शुरूआत हो गई और एक वर्ष बीतते- बीतते बेटा पैदा हो गया । अब क्या था वह बेटे में व्यस्त हो गई और मेरी उपेक्षा और भी करने लगी । पहले ही उसे संभोग पसन्द नहीं था अब बच्चे का बहाना बनाने लगी । बच्चा छोटा है इसलिए उसने दिल्ली अपने माता-पिता के घर में रहने की ज़िद की। मैं भी मान गया कि चलो जिसमें वह खुश है वही ठीक है । बच्चे की देख-रेख भी अच्छी तरह हो जाएगी । मैं काम की वजह से रियाद में ही रहता ,कभी-कभी ही जा पाता उससे मिलने पर मैंने यह हर बार दिल से महसूस किया कि उसे मेरे आने से कोई विशेष खुशी नहीं होती थी । कारण बस एक ही था कि उसे जो पसन्द नहीं था मेरी मांग वही रहती। आखिर मैं भी क्या करता पुरुष जो था।
बच्चा जब एक साल का हुआ मैंने उन्हें अपने पास बुला लिया ।मेरी अनेक कोशिशों के बाद भी उसकी सोच में रत्तीभर भी परिवर्तन नहीं आया । वैसे घर को बहुत साफ-सुथरा रखती थी और खाना भी बहुत अच्छा बनाती । बस उसे सैक्स में रुचि नहीं थी। इसी तरह दिन-माह-वर्ष गुजरते गए और तीसरे वर्ष में एक और बेटा पैदा हो गया । अब यह बेटा क्या पैदा हुआ कि मेरी उपेक्षा वह सगर्व करने लगी, यह कहकर कि अब दो बच्चे हो गए अब यह सब क्यों? मैं क्या कहता मूर्ख बना उसका चेहरा देखता रहता और वह घर और बच्चों में हरवक्त मशगूल रहने लगी । उसे मेरी तनिक भी चिन्ता नहीं थी। मानसिक रूप से मैं काफी परेशान रहता कि यह कैसी बीबी है जो मेरी इच्छा ,मेरी जरूरत का कुछ भी ख्याल नहीं रखती । कई बार इस बात को लेकर हमारे बीच झगड़ा भी होता और संवादहीनता की स्थिति पैदा हो जाती । मैं अक्सर तनाव में रहने लगा और मेरे दिमाग में विचारों का सैलाब उमड़ता रहता । मैं सोचता कि इससे तो अच्छा होता कि मैं शादी ही न करता। शादी से पहले तो एक ही गम था अब तो ज्यादा दुख है । बीबी मेरी बात मानती नहीं और इस समस्या का कोई समाधान भी इस जगह नहीं है।
मुझसे बचने के लिए उसने एक और रास्ता ढूढ़ निकाला और वह दिल्ली रहने के लिए ज़िद करने लगी। मैंने उसे दिल्ली उसके माता-पिता के पास भेज दिया लेकिन हमारे बीच की दूरियां और भी बढ़ गईं । जब भी मैं मिलने जाता उसका रवैया वही होता । जल-भुनकर मैं वापस आ जाता । तब मैंने निर्णय लिया मैं उसे तलाक दे दूंगा क्योंकि मैं उसे अब तंग नहीं करना चाहता था । इस तरह के अपने व्यवहार से मैं अपराधबोध से ग्रसित था। मैंने सोचा यही एक रास्ता है जब मैं उसे और अपने को भी इस अव्यक्त-असहनीय कष्ट से मुक्ति दे सकता हूं।
मैंने अपना दिल कठोर करके उससे बात की। पता नहीं क्यों वह इसके लिए राजी हो गई क्योंकि मैंने बच्चों और उसकी परवरिश के खर्च की जिम्मेदारी लेने का वादा किया शायद इसलिए वह आसानी से मान गई। कानूनी कार्यवाही शुरू हुई और बहुत जल्द परिणाम आ गया । हमारा तलाक तो हो गया लेकिन इसकी कीमत मुझे अपनी अब तक की सारी कमाई देकर चुकानी पड़ी। दिल्ली का फ्लैट और एक प्लाट उसने बेंच दिया और हर माह कोर्ट के निर्णय के अनुसार मैं उसे साठ हजार रुपए भेजता था यही सोचकर कि बच्चों की पढ़ाई ठीक तरह हो जाए और वे स्वावलंबी और अच्छे इन्सान बन जाएं। आजकल वह अपने भाईयों के साथ कनाडा में रहती है ।जब तक बच्चे अठ्ठारह वर्ष के नहीं हो जाते मैं उनसे मिल भी नहीं सकता । बस कभी -कभी फोन पर बात होती है।
परिवार से अलग होकर मैं अन्दर से काफी टूट गया था । स्नेह की तलाश में यहां-वहां भटकता रहता । जीवन का हर सपना बिखर गया था । ऐसा लगता था कि किसके लिए कमाना और जीना? कैसे मैंने अपने आप को संभाला है यह मैं ही जानता हूं । अभी -अभी कुछ ज़िन्दगी व्यवस्थित हुई है ।
“यसमीन ने कहा आपका दुख तो मुझसे भी बड़ा है। आपने शादी शुदा ज़िन्दगी का सुख पाया ही नहीं । खुदा आप पर रहम करे और आपका दुख दूर करदे”।
जय को यसमीन की समीपता में बहुत सुकून मिलने लगा ।ऐसा लगने लगा जैसे वे एक दूसरे को वर्षों से जानते हैं । सुबह होते ही जय इन्तज़ार करता कि कब यसमीन आएगी?
दोंनो रोज मिलने लगे और लाबी के काफी शाप में साथ-साथ काफी और खाना पीते- खाते और एक दूसरे का दर्द बांटते । यह सिलसिला हर रोज चलने लगा दोनों एक दूसरे की समीपता पाने का इन्तज़ार बड़ी बेसब्री से करते । यसमीन बेटा-बहू के साथ घूमने जाने से कतराने लगी। यह कहकर कि वह मुन्ना को संभालेगी वे लोग घूम आएं। बेटा-बहू भी बहुत खुश हुए कि चलो मां साथ नहीं है तो ज्यादा आनंद ले सकते हैं। मां के साथ कुछ शर्म-लिहाज तो करना ही पड़ता है ।अब जब मां खुद अपने आप नहीं आना चाहती तो और भी अच्छा है मुन्ना भी साथ नहीं रहेगा । बच्चे के साथ घूमना फिरना आसान नहीं होता । छोटे बच्चे को कब भूख लगती ,कब प्यास लगती है कुछ पता नहीं होता। इसलिए बच्चा और मां यदि फ्लैट में रहते हैं तो बहुत अच्छा हुआ। युवावस्था प्राइवेसी चाहती है। दोंनो पति- पत्नी सुबह दस बजे निकल जाते ,खूब घूमते फिरते और खरीदारी करते और शाम आठ बजे तक वापस आते। इधर यसमीन बच्चे को खेलाने के बहाने जय के पास जाती और कुछ देर के बाद बच्चे को सुला देती ।जब बच्चा सो जाता तब दोंनो एक दूसरे के बारे में और अधिक जानने की कोशिश में लग जाते । बातों- बातों में समीपता बहुत अधिक बढ़ गई। तब मैंने एक दिन उसके हाथों को लेकर चुंबन ले लिया यह कहकर कि मुझे उसका साथ बहुत सुकून दे रहा है और लगता है कि हम एक दूसरे को सदियों से जानते हैं । मेरे इस व्यवहार से पहले तो वह कुछ सकुचाई किन्तु बाद में मुस्करा दी । उसकी मुस्कराहट से मुझे बल मिला कि इसे भी पुरुष का स्पर्श अच्छा लगा है क्योंकि वर्षों से इसे यह प्यार भरा स्पर्श नहीं मिला । यह मेरी बातों का जादू था या उसकी आत्मा भी प्यार के लिए तरस गई थी कुछ ननकुर करने के बाद उसने कहा मुझे भी आपके साथ रहने पर एक अजीब किस्म की खुशी मिल रही है ।
मैंने तब आगे कहा कि क्यों न हम इन पलों को यादगार बना दें? क्या आप मेरा साथ देंगी?
उसने कहा मैं अभी कुछ नहीं कह सकती मुझे कुछ समय चाहिए ।
मैंने भी संयमित इन्सान की तरह कहा ठीक है मैं आपकी इच्छा का इन्तज़ार करूंगा । वह चली गई । उस रात मैं उसके बारे में ही सोचता रहा। उसका सुन्दर रूप और सुडौल कद मुझे लुभा रहा था । अभी उन्चास वर्ष की ही तो है पर देखने से लगती नहीं। वैसे मुस्लिम औरतें कुदरती खूबसूरत होती हैं। उनकी अदबी और मोहक बातचीत का लहजा किसी भी रसिक को बांध लेने की क्षमता रखता है । यसमीन की भी कातिल अदाएं मेरे दिल में गहरे उतर गईं थीं। यह प्रश्न बार-बार दिलो-दिमाग को झकझोर रहा था कि क्या यसमीन मान जाएगी? रात करवटें बदलते गुजरी । सुबह जल्दी ही उठ गया और जल्दी तैयार होकर यसमीन की प्रतीक्षा करने लगा। आज दस क्यों नहीं बज रहे? हर मिनट मैं घड़ी देखता । एक-एक मिनट वर्षों की तरह लग रहे थे । ऐसी बेचैनी तो पहले कभी नहीं हुई थी आज मुझे यह क्या हो रहा है? अपनी इस बेचैनी को कम करने के लिए कम्प्युटर खोला लेकिन मन नहीं लगा । सोचा काफी मंगवाऊं लेकिन यह ख्याल यह सोचकर झटक दिया कि काफी तो यसमीन के साथ ही पिऊंगा ।
उस रात वह सो न सकी । प्रेम- भावनाओं का ज्वार उठा और दिल उस प्रेम-सागर में डूबने के लिए उतावला हो उठा । कुछ तो प्यासे दिल की पुकार थी और कुछ वातावरण का प्रभाव था क्योंकि यहां पर हर जोड़ा प्यार में डूबा नज़र आ रहा था । ऐसा लग रहा था कि प्रकृति और पुरुष को और कोई दूसरा काम ही नहीं रह गया था सिर्फ प्यार करने के सिवा। मौसम के जादू में मन बहने लगा और वह उस पल का बेसब्री से इन्तज़ार करने लगी जब उसका बेटा- बहू घूमने चले जाएंगे । पल-पल उसे घंटों के समान लगने लगे लेकिन वो पल भी आ ही गया जब वह जय के पास स्नेह के पलों को समेटने- सहेजने के लिए आतुर समर्पित हो गई । वह ज़िन्दगी को एक बार फिर जिन्दादिली से जीना चाहती थी । वर्षों की प्यासी तो थी ही अपनी पूरी ऊर्जा और स्नेह को जय पर उड़ेल दिया। जय भी तो जैसे सदियों का प्यासा था। । वह जानता था कि यह सुख कुछ ही दिन का है इसलिए वह इस अमृत को जी भरकर अधिक से अधिक पी लेना चाहता था और जब साकी ही उदार दिल से पिलाए तब किसे इन्कार हो सकता है?
एक दिन यसमीन ने मुझे बताया कि उसकी बहू सादिया को हमारे संबंध के बारे में पता चल गया है लेकिन वह मुझ पर कुछ भी जाहिर नहीं होने दी। यसमीन यही सोच रही थी कि यह शारीरिक सुख भी कितना प्रबल होता है जो कठोर से कठोर सीमाओं व मर्यादाओं को तोड़ कर पा लेता है। दोंनो का मकसद सिर्फ़ एक ही था एक दूसरे को तृप्त करना ।
जय तो यसमीन के संसर्ग में पूरी तरह डूब जाता । कुछ देर के लिए दोंनो यह भी भूल जाते कि अगर किसी को पता लग गया तो परिणाम क्या होगा?
जय ने यसमीन से कहा कि “आप कितनी अच्छी हैं जो मेरी चिर-प्यास को बुझाने के लिए तन-मन से तत्पर हैं । मैं जीवन भर आपका रिणी रहूंगा।
यसमीन मुस्करा कर बोली “अब यह शरीर की आग किसके लिए बचा कर रखूं अगर यह तुम्हारे काम आ गई तो इसमें बुरा क्या है? बस मैं इतना ही चाहती हूं कि यह किस्सा यहीं खत्म हो जाए फिर कभी तुम मुझे संपर्क करने की कोशिश न करना।
पांच दिन तक यह सिलसिला चलता रहा । प्यार भावनाओं के सिवा किसी वस्तु का आदान-प्रदान नहीं हुआ। न कोई वादा न कस्में न कोई उपहार बस दिल का आदान-प्रदान शारीरिक स्तर पर हुआ किन्तु ऐसा लगा कि यह जन्मों की प्यास बुझा गया। जय को लगा कि यही वह सुख है जिसे वह पाना चाहता था। इस अजनबी औरत ने उसे वह सुख अनायास ही दे दिया बिना किसी शर्तों के कुछ भी तो नहीं मांगा उसने । एक प्रश्न उसके जेहन में कौंध गया कि मुस्लिम औरतें इतनी पाबंदी में रहने के बावजूद क्या इतना बड़ा स्नेहिल दिल रखती हैं? एक वह औरत थी जिसने अग्नि के फेरे लेकर मंत्रौच्चारण के साथ जीवन भर साथ रहने का संकल्प लिया लेकिन निभा न सकी और धन-दौलत पूरा ले लिया इतना ही नहीं अपना भविष्य भी सुरक्षित कर लिया।और एक यह औरत है जिसने एक अजनबी के लिए इतना बड़ा खतरा मोल ले लिया कुछ भी शर्त नहीं रखी। मेरा रोम-रोम इस औरत के प्रति अहसानमंद हो गया था । अगर कोई मुसीबत आती तो शायद मैं उसका साथ भी न दे पाता । इसके आगे मेरा मस्तिष्क जवाब दे गया और मैं कुछ सोचने की स्थिति में नहीं रह गया। बस दिल से उसके लिए हजारों दुआएं अवश्य निकलीं। वह जीवन भर खुश रहे बस एक यही आवाज दिलो दिमाग में गूंज रही थी । मैं उसकी इस कृतज्ञता के एवज में और कुछ दे भी नहीं सकता था।
अब वह दिन भी आ गया जब यसमीन का परिवार विदा ले रहा था मैं उनको छोड़ने एयरपोर्ट गया । मेरा मन अन्दर से बहुत भारी था । दिल में बार -बार यही ख्याल आ रहा था कि इस अजनबी औरत ने मेरे लिए वो किया जो मेरी पत्नी मेरा सब कुछ लेकर भी न कर सकी। कैसा अजीब रिश्ता है? जो इतना अच्छा है ,अवर्णनीय है,उसे अपने पास भी नहीं रख सकते। कैसी विडम्बना है जीवन की? सुख क्षणिक होता है लेकिन अगर हम उसे भूलना चाहे तब भी भूल नहीं पाते। पत्नी के साथ पन्द्रह वर्षो में जो नहीं पा सका वो इसके साथ गुजारे पांच दिनों में ही पा गया । दिल ही दिल मैंने उसे हजारों बार शुक्रिया कहा पर बाहर से शान्त बना रहा।
तभी यसमीन की बहू सादिया ने मेरे पास आ कर कहा”शुक्रिया अंकल, आपने हमारा इतना ख्याल रखा और हमारी अम्मी का भी। यह कहकर वह मुस्काई जैसे कह रही हो कि आपके और अम्मी के संबंधो के बारे में मुझे पता था लेकिन मैं यह सोच कर चुप रह गई कि अम्मी आजकल बहुत उदास रहती हैं इसलिए उन्हें खुश हो लेने दो”।
सादिया ने क्या सोचा क्या नहीं ? शायद यह मेरे मन का भ्रम हो। चोर की दाढ़ी में तिनका जैसी मेरी हालत थी।
अंतिम पल में यसमीन ने एक बार मेरी ओर बहुत प्यार भरी नज़रों से देखा और फिर पलकें हमेशा के लिए झुका लीं और जल्दी से अन्दर चली गई। मै उस ओर देखता ही रह गया। एक अहसास,एक महक, और एक छवि मेरे दिल में हमेशा के लिए छोड़ गई जिसे मैं चाहकर भी भुला नहीं सकता और चाह कर भी उसकी यादों को अलग नहीं कर सकता। *****

— कहानीकार: डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

Advertisements

Responses

  1. कहानी बड़ी सुन्दर लगी. आभार

  2. Respected Dr sahib
    First of all my profound congratulations for such a bold depiction of some beautiful yet not socially accepted relationship.I am amazed to see this aspect of a wonderful poetess like you.After reading this story I got compelled to think whether the type of relationship described is ethical or not.After giving a deep thought I infered that any relationship which gives mutual solace and peace,irrespective of any commitment and is not harming both the persons is a very good relationship.Only lucky few get it specially the phase of life described in your story.Please continue writing as world gets new light from your blessed pen.regards
    Dr Vishwas saxena
    09414550982

  3. Dr.Vishwas ji,

    Thanx once again to you for writing true comments….Regards…

    Dr.Rama Dwivedi

  4. A very good true story……..thanx a lot.

  5. Vinay ji,

    Thanx a lot…. regards…


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: