Posted by: ramadwivedi | मार्च 29, 2009

कविता कामिनी

कविता कामिनी भी है,
कविता दामिनी भी है,
कविता रूठ जाए गर,
दंशदायिनी भी है।

कविता मनोहारिणी,
कविता शक्तिदायिनी,
कविता जब काली बने,
मुण्डमाल धारिणी।

कविता अर्पण सी सरल,
कविता सलिला सी तरल,
कविता निर्झर सी झरे,
रेत सी जाए फिसल।

कविता पूजा-अर्चना,
कविता है समर्पणना,
कविता आचमन का जल,
कविता मंत्रोच्चारणना।

कविता है श्रृंगार भी,
कविता अश्रुधार भी,
व्यष्ठि से समष्ठि तक,
सृष्टि का आधार भी।

डा.रमा द्विवेदी
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Responses

  1. कामिनी, दामिनी, पूजा, अर्चना…….सभी अच्छे नाम लगे:)

  2. बहुत ही सुदर रचना है … बहुत बहुत बधाई।

  3. चन्द्र मौलेश्वर जी एवं संगीता जी,

    कविता पर अपनी राय देने के लिए हार्दिक आभार…

  4. सुंदर रचना के लिए बधाई |

  5. Respected Dr Sahib
    now do you agree with me that since poem is a very effective of shaping society,preserving values and threpautising ailments then my expectation from you to write उपचारात्मक [remedial] poetry is justified.My best compliments for your marvellous poem and regards.
    Dr Vishwas Saxena

  6. bahut sundar rachna.


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