Posted by: ramadwivedi | अप्रैल 2, 2009

रेत के समन्दर सी…..

रेत के समन्दर सी है यह ज़िन्दगी,
तूफ़ां अगर आ जाए बिखर जाए ज़िन्दगी।

अश्कों के झरने ने समंदर बना दिया
सागर किनारे प्यासी ही रह जाए ज़िन्दगी।

जिन बेटियों को जन्म से पहले मिटा दिया,
उन बेटियों को बार-बार लाए ज़िन्दगी।

पैरों की धूल मानकर इनको न रौंदना,
गिर जाए अगर आँख में रुलाए ज़िन्दगी।

चाहे बना लो रेत के कितने घरौंदे तुम,
वक़्त के उबाल में ढ़ह जाए ज़िन्दगी।

जिसका वजूद रेत के तले दबा दिया,
उसको ही चट्टान बनाए यह ज़िन्दगी।

डा.रमा द्विवेदी
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Responses

  1. सुन्दर रचना है।बधाई।

  2. जिन बेटियों को जन्म से पहले मिटा दिया,
    उन बेटियों को बार-बार लाए ज़िन्दगी।

    bahot hi achhe khyaalaat……bahot khub kahi aapne….

    arsh

  3. जिन बेटियों को जन्म से पहले मिटा दिया,
    उन बेटियों को बार-बार लाए ज़िन्दगी।

    पैरों की धूल मानकर इनको न रौंदना,
    गिर जाए अगर आँख में रुलाए ज़िन्दगी।

    waah baht hi sunder,badhai

  4. सुन्दर रचना है!

  5. रमा जी,

    रचना अच्छी है.

    बुरा न माने तो मैं कहूँगा, “अश्रु के झरने ने समन्दर बना दिया” को “आंसूओं के झरने ने समंदर बना दिया” ज्यादा अच्छा लगेगा, क्योंकि आपने उर्दू शब्दों का ही प्रयोग ज्यादा किया है.

  6. परमजीत जी,अर्श जी,महक जी, विनय जी एवं कौतुक जी,

    रचना की सराहना के लिए आप सबका दिल से शुक्रिया…स्नेह बनाए रखें।

    कौतुक जी आपका सुझाव अच्छा लगा मैं सुधार कर दूँगी….हार्दिक धन्यवाद…

  7. सुन्दर रचना के लिए बधाई |

  8. Respected dr sahib,
    Congratulations for your glorious depiction of plight of girl child in INDIA.I am a public awareness consultant and try to do social mobilisation with the help of mighty impressionists like your esteemed self.I worked on gender sensitisation also and tried to eradicate gender biases in and around me.But I cannot win this battle being alone in this war.My efforts are to be reinforced by many people hailing from varied fields.I suggest you something with a request that you have fantastically scanned the plight of a girl child.You know they all exist because very little is written and done to describe the importance of a girl child.I request you to come up with atlest 5-10 compositions of yours to elevate the esteem of a girl child.I have already initiated this 15 years ago,today also my most favourite female is my daughter SRIJNA,
    [9 years old]
    she is my best crtic ,motivator and sometimes teacher.
    I also have a son elder to her,but the ecstasy of fathering a daughter can’t be explained.
    I welcomed the arrival of my daughter with a poetry Entitled :
    TWILIGHT
    Riding fast the steed[अश्व ] of time
    races in the future[my daughter]
    joining the lone present[my son] merrily
    promises to go togather
    making my life bright and bright
    I welcome the arrival of TWILIGHT[उषा ]
    Hoping a battery of brilliant poems from you and with my wishes for this brilliant poemI remain
    DR Vishwas Saxena

  9. डा.विश्वास जी,

    आपका बहुत बहुत हार्दिक शुक्रिया कि आपने अपने अमूल्य विचारों से मुझे अवगत करवाया और सोचने के लिए बहुत सारे विषय दिए । बालिकाओं के लिए और भी लिखा है अगर मैं यूँ कहूँ कि बालिकाएँ एवं नारियाँ ही मेरी सृजनात्मकता के मूलभूत आधार रहें हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी…मैंने कलम उठाई ही इसलिए है कि बेटियों और नारियों के दर्द और समस्याओं को समाज के जन-जन तक पहुँचा सकूँ ताकि कोई तो समझे कि वे भी इन्सान हैं उन्हें असह्य पीड़ा होती है लेकिन कुछ नारियाँ पुरुष की प्रतिद्वन्द्विता में राह भटक जा रही हैं और अपनी स्वतंत्रता का स्वछंदता से उपयोग कर रही हैं… यह बहुत गलत है इससे समाज बदलेगा नहीं और अधिक प्रदूषित हो जाएगा । पुरुष तो स्वछंद प्रवृत्ति का पहले से ही रहा है अब अगर स्त्रियां भी उसी राह पर चल पड़ी तो इस देश कि संस्कृति और सभ्यता को कोई नहीं बचा पाएगा। यह प्रश्न गंभीर चिंतन की अपेक्षा रखता है । पुन: आपकी दिल से आभारी कि आपने अपना मूल्यवान समय मुझे दिया….सादर…

    डा. रमा द्विवेदी


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