Posted by: ramadwivedi | मई 7, 2009

किसी के दरमियाँ यूँ ही

किसी के दरमियाँ यूँ ही नहीं आतीं हैं तलखियाँ,
कोई तो बात होती है गिरातीं हैं बिजलियाँ।

वक़्त के बहाव में बह जाते हैं अक्सर लोग,
किनारे पर उन्हीं की डूब जातीं हैं कश्तियाँ।

किसी का देखकर सुखचैन हो जाते हैं जो ग़मगीन,
द्वेष की आग से ही जल जातीं हैं बस्तियाँ।

बड़े खामोश बैठे हैं नहीं कुछ बात करते वो,
ज़ुबां खोले बिना ही बरस जातीं हैं बदरियाँ ।

चमन के हर सुमन पर भ्रमर का मन मचलता है,
भ्रमर की इस अदा पर ही बहक जातीं हैं तितलियाँ ।

डा.रमा द्विवेदी
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Responses

  1. किसी के दरमियाँ यूँ ही नहीं आतीं हैं तलखियाँ,
    कोई तो बात होती है गिरातीं हैं बिजलियाँ।

    वक़्त के बहाव में बह जाते हैं अक्सर लोग,
    किनारे पर उन्हीं की डूब जातीं हैं कश्तियाँ।

    ……………..सुंदर रचना।

  2. चमन के हर सुमन पर भ्रमर का मन मचलता है,
    भ्रमर की इस अदा पर ही बहक जातीं हैं तितलियाँ ।
    ……………..सुंदर रचना।

  3. वाह .. सुंदर पंक्तियां ..

  4. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने…बधाई..
    नीरज

  5. waah har sher lajawab,kisi ek ki tariif nahi kar sakte,bahut sunder

  6. wah!
    maza agyaa
    zabaradast
    sunder rachna

  7. सारी की सारी लाइनें सुंदर हैं .

  8. बहुत ही सुन्दर कविता है. मैंने भी प्रयास किया है हिंदी मैं ब्लॉगबाजी का. कृपया नीचे लिखे लिंक पर क्लिक करें और अपने विचार बताएं….

    http://rahulkatyayan.wordpress.com

    राहुल कात्यायन

  9. किसी के दरमियाँ यूँ ही नहीं आतीं हैं तलखियाँ,
    कोई तो बात होती है गिरातीं हैं बिजलियाँ।

    -सच?? 🙂

    सुन्दर रचना!!

  10. शिखा दीपक जी,मनविन्दर जी,पृथ्वी जी,नीरज जी, महक जी,शुभाशीष जी,डा. मनोज जी,राहुल जी एवं समीर जी,

    रचना की सराहना करके मेरा उत्साहवर्धन करने के लिए आप सबका बहुत -बहुत शुक्रिया…सादर..

    डा.रमा द्विवेदी

  11. Respected Dr sahib
    Again a thought provoking very high standard, technically brilliant and socially very effective poem from your never failing pen.Please accept my heartiest congratulations.
    Dr,when the rift comes between any two intense persons then only sufferer rediscovers his/her lost self–!
    You know what happens when we enter a profound relationship we live, eat,view, dream and smile of it. So intensely that we lose our own self.A day comes when this relation comes to an end and following a period of pain we get our ownself in reward.I raise a voice to every emotionally alive being that go through this experience you will gain maturity.Regards.
    Dr Vishwas Saxena

  12. डा. विश्वास ,

    आपकी गहन विवेचना के लिए हार्दिक आभार…विलंब के लिए क्षमाप्रार्थी हूं।

    डा. रमा द्विवेदी

  13. बहुत दिनों के पश्चात आप के ब्लाग पर आया हूं। आशा है क्षमा कर ही देंगी।
    डा. रमा जी की लेखनी में ऐसा जादू है कि किसी भी विषय पर शब्दों को मूर्तरूप देकर थोड़े से शब्दों में भावों, उद्गारों और अनुभूतियों को बूंद में सागर के समान समेट कर ऐसे प्रस्तुत करती हैं कि पाठक अभिभूत हो जाता है।

    किसी का देखकर सुखचैन हो जाते हैं जो उदास,
    द्वेश के आग से ही जल जातीं हैं बस्तियाँ।

    चमन के हर सुमन पर भ्रमर का मन मचलता है,
    भ्रमर की इस अदा पर ही बहक जातीं हैं तितलियाँ ।
    बहुत सुंदर.
    महावीर शर्मा

  14. आदरणीय शर्मा जी,

    आपको काफी अर्से बाद देख कर बहुत खुशी हुई…नीरज से मैने पूछा भी था कि आप कैसे हैं। क्षमा तो मुझे ही मांगनी चाहिए कि चाहकर भी आपको मेल न भेज पाई। आप क्षमा मांग कर मुझे शर्मिंदा न करिए। आपकी कमी बहुत खलती रही और याद आती रही हर नई रचना के बाद आपका आशीर्वाद न पाने से कुछ अधूरापन कुछ खाली- खाली सा लगता था। आज आपका आशीष पाकर दिल हर्षौलास से भर गया। आभार शब्द आपके लिए बहुत छोटा है…स्नेह बनाए रखियेगा…सादर..

    डा.रमा द्विवेदी


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