Posted by: ramadwivedi | अक्टूबर 26, 2009

‘मौन’ पर क्षणिकाएँ

1-    मौन-साधना ,
अपने आप मेँ ,
बडा तप है ।

2-     मौन-सागर का,
कोइ निश्चित ,
मापदँड नहीँ होता।

3-     मौन साधक को,
अक्सर लोग
उस व्यक्ति की,
कमजोरी समझ लेते हैँ।

4-    मौन रहकर भी,
सम्वाद होते हैँ।

5-     मौन-निमँत्रण को,
बिरले ही कोइ
समझ पाता है।

6-     मौन की अपनी,
अनुपम अभिव्यक्ति होती है,
जो किसी भाषा की,
मोहताज नहीँ होती।

7-     मौन-सागर मेँ भी,
ज्वार-भाटा उठते हैँ।

8-     मौन अहँकार को,
कम करता है।

9-    झूठ बोलने से ,
अच्छा है,
मौन रह जाना।

10-   मौन की साधना,
साधु-सँत भी,
नहीँ कर पाते।

डा. रमा द्विवेदी

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Responses

  1. सही लिखा-
    3- मौन साधक् को ,
    अक्सर लोग
    उस व्यक्ति की,
    कमजोरी समझ लेते हैँ।

  2. maun jeevan ka ankaha hissa hai,aur agar koi ise sun sake to uske liye shabd ek shor se jyadda khuch nahi.

  3. जय हो!!

    आभार!!

    बहुत उम्दा सदविचार!!


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