Posted by: ramadwivedi | दिसम्बर 6, 2009

क्षणिकाएँ-१

१-     सूरज,चाँद,तारे,

रोज निकलते हैं

आसमां में,

फिर भी जाने क्यों

झोपड़ी में ,

उजाला नहीं होता।

२-      सदियों तक

कोई किसी से

रूठता नहीं,

पर न जाने क्यों खुदा

रूठा  है  गरीब से।

३-     माना कि नासमझ थी मैं,

समझ सकी न तुझको,

क्या तुमने भी,

मुझे समझने की,

ज़रूरत नहीं समझी।

४-    किसी को समझ लेने का,

दावा नहीं करना,

जितना भी समझ लो

उतना ही उलझ जाता है।

५-    समन्दर में,

भयंकर जीवों की  तरह,

इंसान के दिमाग में भी

भयंकर षड़्यंत्र-साज़िश,

एवं सहस्त्रों फ़रेब रहते हैं,

फिर भी इन्हें समझने का

कोई यंत्र  नहीं है।

डा.रमा द्विवेदी

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Responses

  1. झोपड़ी में ,
    उजाला नहीं होता।
    ====
    पर न जाने क्यों खुदा
    रूठा है गरीब से।
    बहुत करीबी क्षणिकाएँ. बहुत सुन्दर

  2. गरीबी साहित्य में अच्छी लगती है, पढ़ी जाती है और सराही भी किन्तु, क्या ये उचित है लिखने के बज़ाए कुछ करे। नही तो यदि लिखने से कुछ संभव होता तो १०० वर्ष में गरीबी हटाओ, बामपंथी कुनबा, आदि-आदि टाइप की चीज़ें इसे दूर कर चुकी होती, किन्तु वो लोग भी गरीबी के नाम पर वोट हपक लेते है और आप वाह.वाह

  3. एम.वर्मा जी एवं कृष्ण कुमार जी,
    रचना पढ़ने एवं प्रतिक्रिया देने के लिए दिली शुक्रिया…कृष्ण कुमार जी आपकी बात सही है लेकिन हर कोई आन्दोलन नहीं कर सकता पर अपने स्तर पर जो कर सकता है शुरुआत वहाँ से भी की जा सकती है…और ऐसा नहीं है कि लोग करते नहीं हैं…जी हाँ, यह कार्य घर से शुरू किया जा सकता है…निस्वार्थ…. लेकिन मैं राजनीति की बात नहीं कर रही,आम आदमी को राजनीति से क्या मतलब? अभी बस इतना ही….सादर…


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