Posted by: ramadwivedi | दिसम्बर 11, 2009

क्षणिकाएँ-२

१-     मौसम के रंग ,

निश्चित समय पर

बदलते हैं,

पर रिश्तों के रंग तो

पल-पल बदलते हैं।

२-     रेखाएँ खींचना मगर,

हथेली की लकीरों की तरह,

कम से कम मिल  सकें ,

कहीं पर तो हम।

३-    धरती की परिधि पर,

सूर्य की तरह

चक्कर मत काटना,

मिलन के लिए,

परिधियों का टूटना,

ज़रूरी है।

४-    कभी तुम तूलिका बनो,

कभी मैं कैनवास बन जाऊँ,

कभी तुम मुझमें रंग भरो,

कभी मैं तुझ में डूब जाऊँ।

५-    रंगों का समन्वय,

कुछ इस तरह करना,

जीवन का कोई कोना,

रह जाए न उदास।

६-    ज़िन्दगी की एक भूल,

कई खुशियों को,

निगल सकती है।

७-  ` ईर्ष्या’ मनुष्य को,

बना देता है

खूख़्वार शेर|

८- ` अहंकार’ सुनामी से,

कम नहीं

वह पल भर में,

बहुत कुछ,

लील जाता है ।

डा.रमा द्विवेदी

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Responses

  1. क्षणिकाएँ सभी इतनी भावपूर्ण है कि किसकी तारीफ़ करे …किसे छोड़े…
    मगर फिर भी …
    रेखाएँ खींचना मगर,
    हथेली की लकीरों की तरह,
    कम से कम मिल सकें ,
    कहीं पर तो हम।

    और

    मौसम के रंग ,
    निश्चित समय पर
    बदलते हैं
    पर रिश्तों के रंग तो पल-पल बदलते हैं।
    बहुत प्रभावित करती हैं …!!

  2. सुन्दर

  3. वाणी गीत जी एवं कृष्ण कुमार जी ,

    रचना की सराहना के लिए शुक्रिया..


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