Posted by: ramadwivedi | जनवरी 16, 2010

यह बचपन कितना निर्द्वन्द?

यह बचपन कितना निर्द्वन्द,

खुश हैं ये कितने रंगों के संग।

मस्ती  करते, धूम  मचाते,

आगे – पीछे   दौड़  लगाते,

नीला  -पीला  और  हरा,

लाल,  गुलाल  कर  दें  ये धरा,

नहीं  भंग  पी फिर भी झूमै जैसे मतंग ।

यह   बचपन   कितना  निर्द्वन्द?

नाचे –  गाएं  धूम  मचाएं,

भर -भर  मारै  पिचकारी,

नहीं  देखते  उम्र  को ये,

इनके  लिए   समान  सभी,

अंजुरि  भर  गुलाल  मले मुख  पर,

और  करें  हुडदंग…..

यह बचपन कितना  निर्द्वन्द?

होली  तो  भेदभाव  मिटाती,

नर – नारी   का  मेल  कराती,

होली  खेलें  शालीनता  से,

संदेश  यही  देते  रंग  होली  के,

देखना   कहीं   कोई  रंग  हो न जाए बदरंग ?

यह  बचपन   कितना  निर्द्वन्द  ?

डा. रमा द्विवेदी

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Responses

  1. होली आने में तो अभी समय है…पढ़ कर अच्छा लगा. सुन्दर संदेश.

  2. “बचपन पर एक सुंदर गीत!”

    मिलत, खिलत, लजियात … … ., कोहरे में भोर हुई!
    लगी झूमने फिर खेतों में, ओंठों पर मुस्कान खिलाती!
    संपादक : सरस पायस


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