Posted by: ramadwivedi | मार्च 2, 2010

‘प्यार’ पर तीन मुक्तक

              

    १-   यह कैसा है प्यार तुम्हारा,
         तुमने हमको किया नकारा ,
         तेरे खातिर प्राण दे दिए,
         फिर क्यों मेरा प्यार है हारा?

    २-  साँसों  से साँसें टकराई,
        तब हमने थीं कसमें खाईं,
        साथ जिऐंगे, साथ मरेंगे,
        दिल ने दिल से करी सगाई ।

    ३-  प्यार हमें  तरसाता  भी है,
        प्यार हमें  सहलाता भी है,
        दिशा बदल जाए गर प्यार की,
        प्यार  हमें तड़पाता भी है।

         डा.रमा द्विवेदी

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Responses

  1. अत्यंत सुन्दर रचना …बधाईयाँ !

  2. प्यार हमें तरसाता भी है,
    प्यार हमें सहलाता भी है,
    दिशा बदल जाए गर प्यार की,
    प्यार हमें तड़पाता भी है।
    बहुत खूबसूरत रचना बधाई आपको

  3. प्यार हमें तरसाता भी है,
    प्यार हमें सहलाता भी है,
    दिशा बदल जाए गर प्यार की,
    प्यार हमें तड़पाता भी है।
    वाह बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

  4. nice

  5. बेहतरीन!

  6. आदरणीय डॉ साहेब
    आपकी हाल की भेजी कविता पढ़ी .वैसे यह तो कहने की आव्यशाकता ही नहीं है ही नहीं है की रचना उत्तम लिखी है .हाँ में इस समबन्ध में अपने कुछ विचार व्यक्त कर रहा हूँ :
    प्यार एक इश्वरिये भाव है जो की इश्वर द्वारा ही दिया हुआ है .इसकी अभिवक्ति करना मानवीय धरम जरूर है किन्तु इसे स्वीकृत होना आवयशक नहीं .ये भाव मानव संभाल सके बहुत अच्छी बात है नहीं संभल सके तो इसे इश्वरिये देन मानकर अपने पास ही सम्भाल कर रखें .इसे किसी की स्वीकृति का आश्रित न बनाएँ यह भावना मान्वियेता को जीवित रखने के लिए है .आप अपनी कविता में ये सन्देश जीवित रखें मेरी शुभकामनाएँ
    डॉ विश्वास सक्सेना

  7. आदरणीय डा.विश्वास जी,
    आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया पढ़ी …बहुत अच्छा लगा।आप सही कहते हैं प्यार ईश्वरीय देन है लेकिन अभिव्यक्ति बहुत आवश्यक है फिर चाहे वो शब्दों में हो या लेखन में …कवि सिर्फ अपना कर्म करता हैक्योंकि यह उसका अहसास और अनुभूति है जिसे वह सिर्फ व्यक्त करता है कोई उसे कैसे लेता है या नहीं लेता इससे उसके दिल के अहसास कम नहीं होते ऐसा ही सच्चे प्यार में होता है….वह किसी के प्रतिदान पर निर्भर नहीं करता यह खुश्बू की तरह है जो खुद को नहीं दूसरों को महकाती है….शेष फिर कभी….सादर…..

    रमा द्विवेदी

  8. साँसों से साँसें टकराई,
    तब हमने थीं कसमें खाईं,
    साथ जिऐंगे, साथ मरेंगे,
    दिल ने दिल से करी सगाई ।
    mjue achalaga

  9. साँसों से साँसें टकराई,
    तब हमने थीं कसमें खाईं,
    साथ जिऐंगे, साथ मरेंगे,
    दिल ने दिल से करी सगाई
    kitni khubsurat sagai,hmmmm,mann moh liya is muktak ne.sunder.

  10. chaar lino me bhaw ko prakat karna kathin hi nahi namumkin hota hai. bhaw pachh par apki pkar achhi hai. meri shubhkamnaye. By-Rajeev Matwala


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