Posted by: ramadwivedi | अप्रैल 11, 2010

प्यार पर दो क्षणिकाएँ

        
 
  १-   तुम दूर  हो या पास ,
       तुम्हारे प्यार का अहसास,
       मेरी साँसों  में ,
       संगीत भर देता है।
 
 
  २-   ‘प्यार’ वह संजीवनी है,
       जो ऊसर ज़मीन को भी ,
       उर्वरा बना देती है ।
 
        डा.रमा द्विवेदी
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Responses

  1. अच्छा कहा गया है….
    शब्दों की बाज़ीगरी…

  2. वास्तव में संगीत की पूर्णता प्यार के अस्तित्व से ही जूडी हूई है यदि प्यार न हो तो संगीत अपूर्ण ही तो है. यह अहसास अगर प्राप्त हो जाय तो पृथ्वी पर ही स्वर्ग उतर पड़ता है . और प्यार की ताक़त तो पत्थर में भी चेतना भर देती है . बहुत ही उत्कृष्ट विचार सहजता से रखे गए हैं .बधाई
    डॉ विश्वास सक्सेना

  3. वास्तव में संगीत की पूर्णता प्यार के अस्तित्व से ही जूडी हूई है यदि प्यार न हो तो संगीत अपूर्ण ही तो है. यह अहसास अगर प्राप्त हो जाय तो पृथ्वी पर ही स्वर्ग उतर पड़ता है . और प्यार की ताक़त तो पत्थर में भी चेतना भर देती है . बहुत ही उत्कृष्ट विचार सहजता से रखे गए हैं .बधाई
    डॉ विश्वास सक्सेना

  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति
    bahut khub

    http://kavyawani.blogspot.com/

    shekhar kumawat

  5. ‘प्यार’ वह संजीवनी है,
    जो ऊसर ज़मीन को भी ,
    उर्वरा बना देती है ।

    sahi kaha aapne

  6. रवि कुमार जी, डा. विश्वास जी, शेखर जी व शुभाशीष जी,
    उत्साहवर्द्धन के लिए आप सबका बहुत बहुत हार्दिक आभार ….

    डा. रमा द्विवेदी


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