Posted by: ramadwivedi | जुलाई 7, 2010

झूठ को लपेट कर

सच की कुर्सी पे बैठा है झूठ, झूठ को लपेटकर।
सच डरा-सहमा सा है,झूठ -चाल देखकर॥

ब्लैक-ब्लैक बाल हैं,ब्लैक -ब्लैक कोट है,
ब्लैक-ब्लैक गाउन है, ,ब्लैक-ब्लैक पैंट है
ब्लैक शूज,ब्लैक चाल,ब्लैक-ब्लैक बोल कर।
ब्लैक सोच ,ब्लैक धंधे,ब्लैक मनी ठूँस कर।
सच डरा- सहमा सा है झूठ चाल देखकर॥

प्यादा से फ़र्जी बना गर टेढ़ो-टेढ़ो जाता है,
भेड -खाल ओढ़कर वह खुद पे ही इतराता है।
दूज के चाँद -सा गले में सच लटक रहा ,
तम को निगल जाता मगर पूर्ण उजली रात बन ।
जीत जाता अंत में सच झूठ को पछाड़ कर ॥
 
डा.रमा द्विवेदी

( सिविल कोर्ट में झुंड के झुंड वकीलों को देख कर यह कविता लिखी गई है )

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Responses

  1. बड़ा ही भीषण दृष्य उत्पन्न हो रहा है.

  2. सच की कुर्सी पे बैठा है झूठ, झूठ को लपेटकर।
    सच डरा-सहमा सा है,झूठ -चाल देखकर॥
    सच्चाई को दर्शाती एक सुंदर रचना , बधाई

  3. मैं सहमत हूँ अनूप शुक्ल और समीर लाल से ! डरा दिया आपने ! शुभकामनायें !

  4. सच की कुर्सी पे बैठा है झूठ, झूठ को लपेटकर।
    सच डरा-सहमा सा है,झूठ -चाल देखकर॥

    satya panktiyan hain

  5. समीर जी,सुनील जी, सतीश जी एवं शुभाशीश जी,
    रचना की सराहना के लिए आप सबका हार्दिक आभार…


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