Posted by: ramadwivedi | अगस्त 10, 2010

फिर भी

दिल में इक दीप जलाए बैठे हैं।
आँधियों से खुद को बचाए बैठे हैं॥

हौसला तोड़ना ही काम लोंगो का ।
सबको हम आजमाए बैठे हैं॥

हर तरफ़ झूठ की हैं कलाबाजियाँ।
फिर भी हम सच को बचाए बैठे हैं॥

वफ़ा-ए-इश्क में सबको वफ़ा नहीं मिलती।
फिर भी हम सब कुछ लुटाए बैठे हैं॥

ज़िन्दगी मयखाना बन गई है यहाँ।
मयकशों की महफ़िल सजाए बैठे हैं॥

दिल की आवाज कौन सुनता है यहाँ?
फिर भी हम उम्मीद लगाए बैठे हैं॥

डा.रमा द्विवेदी
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Responses

  1. excellent depiction of emotions.A conviction fading out fast now a days.

  2. bahut he khub ghazal
    bahut sundar

  3. डा. विश्वास जी एवं शुभाशीष जी,

    रचना को पसन्द करने के लिए हार्दिक शुक्रिया….


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