Posted by: ramadwivedi | जुलाई 31, 2011

बांचे न कोय

१- गीत-संगीत
मन को बहलाए
खुशियां लाए |

२- भाग्य विधाता
लिक्खा सबका भाग्य
बांचे न कोय |

३- बूढ़ी आंखों से
घन-घन बरसे
पूत न आवै |

४- मोती-सी बूंदे
मुखड़े को चूमती
धरा झूमती |

५- मेघा बरसे
बिजुरिया चमके
मनुआ डरे |

६- प्यार का स्पर्श
पत्थर पिघलाता
मूर्ति गढ़ता |

७- रिक्त न होवे
उम्मीदों का आकाश
बची है आस |

९- आग का गुण
सिर्फ जलना नहीं
जलाना भी है |

१०- सोचने लगे
क्यों नहीं लौट चले
आस्था की ओर |

डा. रमा द्विवेदी
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Responses

  1. रमा जी आपके ये हाइकु तो बहुत लाजवाब है,ब । एक -एक शब्द मन को छू गया । ३- बूढ़ी आंखों से
    घन-घन बरसे
    पूत न आवै |

    ४- मोती-सी बूंदे
    मुखड़े को चूमती
    धरा झूमती |
    -प्रकृति का मनोरम रूप दर्शनीय है ।
    ५- मेघा बरसे
    बिजुरिया चमके
    मनुआ डरे |

    ६- प्यार का स्पर्श
    पत्थर पिघलाता
    मूर्ति गढ़ता |
    प्यार की तीव्र संवेदना मन को बहुत गहरे तक छू गई ।
    ७- रिक्त न होवे
    उम्मीदों का आकाश
    बची है आस | निराशा के पलों में भी जीने की प्रेरणा

  2. आदरणीय हिमांशु जी,
    आपकी विश्लेषात्मक टिप्पणी पाकर मैं रोमांचित हूं । आप हाइकु लेखन में निपुण व सजग लेखक हैं आपकी अमूल्य टिप्पणी पाकर मेरी सृजनात्मकता को नई ऊर्जा,नई स्फूर्ति मिलती है । बहुत- बहुत हार्दिक आभार…..


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