Posted by: ramadwivedi | अगस्त 10, 2011

दर्द भी तो चाहिए (गीत)

ज़िंदगी को जीने के लिए ,दर्द भी तो चाहिए ज़नाब ।

घर से चले थे यकीं को साथ लेके हम ,
ढ़ूँढ़ लेंगे मंज़िलें कभी न कभी हम ,
चलते -चलते रास्ते ये और लंबे हो गए ,
पीछे मुड के देखा तो वे रास्ते भी खो गए,

मंज़िलों को पाने के लिए छाँव भी तो चाहिए ज़नाब ।
ज़िंदगी को जीने के लिए ,दर्द भी तो चाहिए ज़नाब ॥

ज़िंदगी में रोज नए रिश्ते बन तो जाएगे,
ज़िंदगी की राहों में रिश्ते निभ न पाएगे,
रेत की तरह यह ज़िंदगी भी फिसल जाएगी ,
देखते ही देखते बात बिगड़ जाएगी ,

रिश्तों को निभाने के लिए प्यार भी तो चाहिए ज़नाब।
ज़िंदगी को जीने के लिए ,दर्द भी तो चाहिए ज़नाब ।

ज़िंदगी है बेवफ़ा यह हाथ नहीं आएगी ,
साथ में यहाँ से अपने लेके कुछ न जाएगी,
हमसफ़र हो साथ में तो राह निकल आएगी ,
ज़िंदगी भी खुश्बुओं से और महक जाएगी,

हर खुशी को पाने के लिए हौसला भी चाहिए ज़नाब।
ज़िंदगी को जीने के लिए ,दर्द भी तो चाहिए ज़नाब ।

ज़िंदगी है इक जुआ सभी को यहाँ खेलना है,
हार हो या जीत हो सभी को पाँसे फेकना है,
ज़िंदगी की हर मुसीबतों को हमें झेलना है,
ज़िंदगी का आखिरी दाँव हमें खेलना है,

गिर के संभल जाने के लिए वक़्त भी तो चाहिए ज़नाब
ज़िंदगी को जीने के लिए,दर्द भी तो चाहिए ज़नाब ।

डा. रमा द्विवेदी
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Responses

  1. आपका गीत बहुत भावपूर्ण और दिल को छूने वाला जीवन का अनुभूत सत्य है ! मैं तो यही कहना चाहूँगा-
    जला ले चिराग रौशनी के लिए
    लगा ले दाग ज़िन्दगी के लिए
    दर्द से बड़ी कोई नियामित नही
    बचा ले कुछ आग बन्दगी के लिए

  2. आदरणीय डॉ. रमा द्विवेदी जी
    सादर प्रणाम !

    आपकी रचनाएं बहुत सराहनीय हैं … प्रस्तुत गीत भी बहुत अच्छा है –
    घर से चले थे यकीं को साथ लेके हम ,
    ढूंढ़ लेंगे मंज़िलें कभी न कभी हम ,
    चलते -चलते रास्ते ये और लंबे हो गए ,
    पीछे मुड के देखा तो वे रास्ते भी खो गए,

    मंज़िलों को पाने के लिए छांव भी तो चाहिए ज़नाब
    ज़िंदगी को जीने के लिए ,दर्द भी तो चाहिए ज़नाब

    पूरा गीत जीवन की सच्चाइयों की अभिव्यक्ति है …
    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !


    आगामी रक्षाबंधन और स्वतंत्रता दिवस की मंगलकामनाओ के साथ

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

  3. हिमांशु जी ,
    आपका आशीष इस रचना को भी मिला….साथ में बहुत सुन्दर मुक्तक भी….सच है दर्द न होता तो सुख का भी कोई मूल्य न रह जाता….बहुत-बहुत आभारी हूं |

  4. राजेन्द्र जी,
    आपने इस गीत की सराहना की यह आपकी उदारता है …आप तो खुद ही सिद्ध गीतकार है …..स्नेह बनाए रखियेगा ….बहुत -बहुत हार्दिक आभार
    रक्षाबंधन और स्वतंत्रता दिवस की अनंत शुभकामनाएं

  5. आदरणीय डॉ. रमा द्विवेदी जी,
    नमस्कार !
    दिल को छूने वाला गीत….
    जीवन की सच्चाइयों की अभिव्यक्ति …..

    मैं तो बस इतना कहना चाहती हूँ

    जिन्दगी भ्रम
    सुलघते वजूद
    सब नश्वर
    हरदीप

  6. प्रिय हरदीप जी ,
    इस गीत को आपका स्नेह मिला ….हर्षित हूं ….
    सारगर्भित हाइकु इनाम स्वरुप प्राप्त हो गया ….बहुत-बहुत अच्छा लगा …..दिल से शुक्रिया …

  7. आदरणीय डॉ. रमा द्विवेदी जी,
    नमस्कार !
    गिर के संभल जाने के लिए वक़्त भी तो चाहिए ज़नाब
    ज़िंदगी को जीने के लिए,दर्द भी तो चाहिए ज़नाब ।

    भाव भरी रचना ने जीवन के कई पहलुओं को उजागर कर दिया…

  8. प्रिय इंदु जी,
    गीत की सराहना के लिए बहुत- बहुत शुक्रिया …स्नेह बनाए रखें …..


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