Posted by: ramadwivedi | सितम्बर 10, 2011

अहं- कैद से ( गीत)

कभी मंजिलो पे हम पहुंचे ही नहीं
कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं ||

जिंदगी के झमेले ,झमेलों के मेले,
झमेलों के मेले,
उलझनों में उलझ कर सुलझे ही नहीं|
कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं |

जो चाहा था कहना ,कह न सके हम
कह न सके हम ,
कभी सुन सके न तुम कभी हम नहीं|
कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं ||

चिदानंद का वो क्षण पा न सके हम,
पा न सके हम ,
मिलन की वह मंजिल मिली ही नहीं |
कभी तुम नहीं तो, कभी हम नहीं ||

रेत-सी दिल की मुठ्ठी बिखरती ही जाए,
बिखरती ही जाए,
अहं- कैद से हम निकले ही नहीं |
कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं ||

डा. रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

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Responses

  1. बहुत सुन्दर …आपका मार्गदर्शन पाने की इच्छा होती है …..

  2. अहं- कैद से हम निकले ही नहीं |
    कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं ||
    अद्भुत एवं वास्तविक…

  3. उपेन्द्र जी एवं इंदु जी ,
    आपका स्नेह मिला …बहुत-बहुत दिल से शुक्रिया …
    उपेन्द्र जी जब कभी आपको मेरे मार्गादर्शन की जरूरत हो नीचे दिए ई मेल पर संपर्क करिएगा …

    ramadwivedi53@gmail.com

  4. मन को छूने वाला गीत ।विशे्ष रूप से ये पंक्तियाँ तो लाजवाब हैं- उलझनों में उलझ कर सुलझे ही नहीं|
    कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं |

  5. हिमांशु जी,
    उत्साहवर्द्धन के लिए बहुत -बहुत दिल से शुक्रिया ….

  6. “कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं” बहुत सुन्दर. आभार.

  7. सुब्रमनियन जी , बहुत-बहुत हार्दिक आभार ….


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