Posted by: ramadwivedi | अक्टूबर 29, 2011

सूर्य हुआ लापता

१- धुंध ही धुंध
सूर्य हुआ लापता
रजनी रोई |

२- कठिन होता
रचनात्मक कार्य
ध्वंस आसान |

३- माँ की ममता
यूँ कैसे हार जाती
बेटी न जने |

४- संहार मत
अपने स्वरुप को
माँ आने भी दे|

५- इतना बौना
कैसे हुआ आदमी
माँ-पा न भाएं |

६- नजदीकियाँ
सुख ही नहीं देती
तलखियाँ भी |

७- पूस की ठण्ड
अम्बर-धरा संग
मन उमंग |

८- मृत्यु के डर
जीना नहीं छोड़ते
कर्मठ व्यक्ति

९- वफ़ा का वादा
चाँद न भी निभाए
सूर्य मुस्काए |

१० – सूर्य की ऊष्मा
चाँद की शीतलता
धरा मुस्काई |

११- श्वेत चादर
ओढ़ कर सोई है
अम्बर झरे |

डा. रमा द्विवेदी
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Responses

  1. एक से एक बढ़िया!

  2. किसी एक हाइकू की तारीफ़ करना संभव नहीं क्योंकि सभी एक से बढ़ कर एक , बधाई

  3. ज्ञानदत्त जी एवं सुनील कुमार जी ,
    आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार …

  4. rama jee kafi achhi lagi surya hua lapta shuru ki panktiya मृत्यु के डर
    जीना नहीं छोड़ते कर्मठ व्यक्ति kafi achhi lagi. yahi yatharth hai.

  5. भीमा राव जी ,
    बहुत-बहुत हार्दिक आभार ….अपने विचार प्रेषित करने के लिए ….

  6. धुंध ही धुंध
    सूर्य हुआ लापता
    रजनी रोई |
    अच्छा शब्द चित्र, शब्दों की तूलिका से रचा ।

  7. हिमांशु जी ,
    रचना पसंद करने के लिए बहुत -बहुत हार्दिक आभार ……


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