Posted by: ramadwivedi | नवम्बर 25, 2011

ढूँढती समाधान (ताँका)

1
अजब भाषा
बाँच न पाए कोई
झीनी चुनरी
देख सके न आँख
रहें प्रेम में खोई
2
पानी-ही पानी
प्यासा समंदर क्यों
ढूँढ़े नदी को
नदी ढूँढ़ती उसे
अजीब रिश्ता यह ?
3
चुप्पी जो खिंची
फ़ासला बढ़ गया
बेवज़ह ही
रिश्ते को डस गया
ग्रहण लग गया ।
4
नग्न शज़र
रोता है जार-जार
तलाशता है
हरित परिधान
कब होगा विहान ?
5
फिजाएँ गाएँ
हवा गुनगुनाए
संध्या की बेला
पर्वत हो अकेला
बंजारा गाता जाए ।
6
हरे-भरे जो
कल पीले होकर
मिट्टी में मिल
ठूँठ रह जाएँगे
नवांकुर आएँगे ।
7
बूँदें बरसीं
टप-टप टपकीं
अखियाँ रोईं
सुधियाँ उड़ आईं
हर्षित-मन भाईं ।
8
रिश्ते में धोखा
ताउम्र वनवास
मन का त्रास
दिल की चाहत का
ढूँढती समाधान ।
9
सात फेरे भी
रिश्ते बचा न पाएँ
व्यर्थ वचन-
प्रणय -अनुबंध
झूठे सब सम्बन्ध ।
10
खो गया सब
सभ्यता की दौड़ में
सुख-सुकून
दौड़ रहे फिर भी
चौधियाई आँखों से।

डॉ०रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

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Responses

  1. सभी ताँका बहुत भावपूपूर्ण हैं।ये दो ताँका तो बहुत गहराई लिये हुए हैं-बूँदें बरसीं
    टप-टप टपकीं
    अखियाँ रोईं
    सुधियाँ उड़ आईं
    हर्षित-मन भाईं ।
    8
    रिश्ते में धोखा
    ताउम्र वनवास
    मन का त्रास
    दिल की चाहत का
    ढूँढती समाधान ।

  2. हिमांशु जी ,
    ` ताँका ‘इस नई विधा के प्रथम लेखन पर आपकी प्रेरणा और आशीर्वाद प्राप्त हुआ यह मेरे लिए सच में खुशी की बात है…..बहुत -बहुत हार्दिक आभार …..आत्मीयता बनाए रखियेगा ….सादर …


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