Posted by: ramadwivedi | दिसम्बर 26, 2011

खोने को हैं बेताब

१- ढोती है रात
मनुज की पीडाएं
भोर की आस |

२- मुखौटे लगा
खोने को हैं बेताब
चैटिंग – यार |

३- हैं अनजान
अडोस-पड़ोस से
सर्फिंग -प्यार |

४- ऊषा मुस्काई
भौंरे गुनगुनाए
ताजगी आई |

५- आँगन धूप
भागती फिर रही
छत-मुडेर |

६- आसमां झुक
धरा से कहता ये
तुझ से ही मैं |

७- ऊंघती आँख
अँधेरे सन्नाटे में
आल्हा सुने है |

डा. रमा द्विवेदी
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Responses

  1. आसमां झुक
    धरा से कहता ये
    तुझ से ही मैं |
    वाह …बहुत खूब कहा है आपने …आभार ।

  2. हायकू की निश्चित सीमा में सुन्दर भाव !

  3. सदा जी व वाणी गीत जी ,
    रचना पसंद करने के लिए हार्दिक आभार …..


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