Posted by: ramadwivedi | मार्च 18, 2012

दंभ की आग- हाइकु

१- क्या -क्या जंजाल
इक्कसवीं सदी में
सब बेहाल |

२- दंभ की आग
जल रहा आदमी
बुझे तो कैसे?

३- जीवन -यात्रा
फूल हों या हों काँटे
फिर भी चलें|

४- शीत-लहर
प्रकृति का कहर
मौत -पैगाम |

डा. रमा द्विवेदी

© All Rights Reserved

Advertisements

Responses

  1. सब बेहाल…
    बेहतर…

  2. R.K.`HIMANSHU’

    सही कहा आपने दंभ की आग सब कुछ जलाकर रख देती है ;क्योंकि उसने बुझना नहीं जाना है –

    दंभ की आग
    जल रहा आदमी
    बुझे तो कैसे?

  3. बहुत ही बढिया प्रस्‍तुति ।

  4. रवि जी ,हिमांशु जी एवं सदाजी ,
    रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार …


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: