Posted by: ramadwivedi | जुलाई 4, 2012

बाँचते गए-हाइकु

1-बाँचते गए
वधुओं की यातना
मूक बनके ।

2 ताउम्र ढोए
निर्जीव बने रिश्ते
उम्मीद लिए |

3-बैठी उदास
खाने की प्रतीक्षा में
मिटे न भूख |

4- बच्चे बेबाक
दखल भाए नहीं
हम हैं सही |

डा. रमा द्विवेदी

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Responses

  1. दोनों हाइकु में आज के पारिवारिक जीवन की विसंगति का भावपूर्ण चित्रण है । बहुत बधाई रमा जी ।

  2. हिमांशु जी ,अरसे के बाद आपका आशीष मिला …बहुत-बहुत धन्यवाद …


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