Posted by: ramadwivedi | नवम्बर 4, 2012

प्रीत की राह में (गीत)

मीत की चाह में प्रीत की राह में
एक दिल को लिए हम भटकते रहे ।

वो मिले न कभी कल्पना ही रही
दिल तड़पता रहा प्यास बढ़ती रही
एक झरने की इक बूँद के वास्ते
ज़िंदगी में लगातार चलते रहे ।
मीत की चाह में प्रीत की राह में
एक दिल को लिए हम भटकते रहे ।

कल्पना में बसा किन्तु पा न सके
सांस चलती रही किन्तु गा न सके
खो गए हम कहाँ मीत की चाह में
ज़िंदगी भर उन्हें ढूँढते ही रहे ।
मीत की चाह में प्रीत की राह में
एक दिल को लिए हम भटकते रहे ।

मन खिला भी न था और मुरझा गया
दिन ढला भी न था और तम छा गया
अश्क बहते रहे दिल न संभला कभी
गम के दरिया में खुद को डुबाते रहे ।
मीत की चाह में प्रीत की राह में
एक दिल को लिए हम भटकते रहे ।

डॉ रमा द्विवेदी
© All Rights Reserved

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