Posted by: ramadwivedi | अप्रैल 19, 2013

बूढ़ी देह का मोल -हाइकु

1-फूल ने रचा
बूंदों के सौन्दर्य से
काव्य नवीन ।

2-जवानी ख़त्म
बूढ़ी देह का मोल
हो जाता कम ।

3- खिलता मन
नई कोपलें देख
विस्मृत गम ।

4-बीत गया जो
खो देता है वजूद
विस्मृत गंध ।

5-संध्या से प्यार
दर्द व प्यार भरा
सम्मोहन वो ।

डॉ .रमा द्विवेदी
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