Posted by: ramadwivedi | दिसम्बर 2, 2013

`परिकल्पना समय’ में प्रकाशित `साँसों की सरगम’ की समीक्षा

Sanson-Ki-Sargam-Cover-01 (6)

‘साँसों की सरगम’ या व्यक्त्तित्व का दर्पण?

कथा-कहानी , कथानक और संवाद के रूप में साहित्य यदि समाज का दर्पण है तो वही साहित्य, कथ्य, तथ्य, संवेदना और प्रतिक्रिया के रूप में है रचनाकार के व्यक्त्तित्व का निर्मल दर्पण भी | यह कथन अक्षरशः प्रमाणित होता है – “साँसों की सरगम” हाइकु संग्रह पढने के बाद संवेदनशील रचनाकार डॉ रमा द्विवेदी के सन्दर्भ में | आधुनिक हिंदी साहित्य में हाइकु विधा के प्रति एक अतिरिक्त आकर्षण का व्यामोह रचनाकारों में तेजी से फ़ैल रहा है| मुझे वह दिन भी अच्छी तरह याद है जब दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर डॉ. आर. के. त्रिपाठी ने अपना एक हाइकु संग्रह 1984 में आशीर्वाद स्वरुप भेंट की थी, लेकिन तब मुझे यह विधा बड़ी अटपटी सी लगी थी और सच कहूँ तो कुछ विद्रूप सी भी | इस विद्रूपता का प्रथम कारण तो इस विधा का अपना अनूठा स्वरुप ही था जो परंपरागत विधाओं से एकदम अलग था और दूसरा शायद इसका विदेशी होना भी था | हाइकु एक ऐसी जापानी काव्य-विधा है जो ५ – ७ – ५ के वर्ण स्वरुप में गुम्फित अपने संस्कार और घनीभूत कसाव के कारण यह ऐसा कथ्य विम्ब प्रस्तुत करता है कि वह पाठक के मन-मस्तिष्क में सम्वेदनाओं का अर्थ-प्रसार एक विस्फोट की सी झटके के साथ होता है, झटके की तीव्रता मन-मस्तिष्क को झकझोर देती है और पाठक बरबस तथ्य और संवेदनाओं से जुड़ ही जाता है | अंतर्मन में संघनित वे एहसास, वे दर्द, अन्धविश्वास, कुरीतियाँ, बुराइयाँ पाठक को स्वयं अपनी निजी लगने लगती हैं, और इसकी प्रतिक्रिया में समाधान की एक झलक पाकर वह इनका सामना करने के लिए, इसे मिटाने तथा जड़ से उखाड़ फेंकने के लिये स्वयं को तैयार करने लगता है. वह अपनी निद्रा तोड़कर, तन्द्रा-आलस्य छोड़कर कर्त्तव्यपथ पर डट जाने को उद्यत हो उठता है. इस कर्तव्यपथ पर प्रेरित और अग्रसारित करना ही तो साहित्यकार का सर्जक और सैनिक स्वरुप है. शायद इसी तीव्रता के कारण साहित्यकारों का मोह, लगाव और जुडाव हाइकु के प्रति लगातार बढ़ रहा है|

आलोच्य पुस्तक “साँसों की सरगम” में वास्तव में कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जो अंतर्मन को झकझोरती हैं, सुप्त चेतना जागृत करती हैं, अपने कृत्यों पर स्वमूल्यांकन का, संशोधन और परिशोधन का, अस्मिता की रक्षा का, कर्तव्य पथ और नैतिक-पथ पर डट जाने का और यही तो लेखन की सफलता है, इससे अधिक एक साहित्यकार समाज को दे भी क्या सकता है? साहित्यकार समाज में और सीमापर स्वयं लड़ता नहीं, लडाता है बहादुरों को, सैनिकों को |वह जोश-उत्साह-उमंग और शौर्य का संचार कर सैनिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जूझने की प्रेरणा, शक्ति और साहस देता है| एक नारी होने के कारण इस संग्रह की रचयिता डॉ रमा द्विवेदी जी ने नारीचेतना, नारीअस्मिता और नारी जीवन के दुःख-दर्द को युक्ति और तर्क के साथ निर्भीक और निडर होकर नारी की मातृत्त्व शक्ति को महिमा मंडित करते हुए रेखांकित किया है. बढती हुयी कन्या भ्रूण हत्या के प्रति उनकी घृणित मानसिकता के लिए समाज को ही नहीं, अपने परिवार और पति को भी कठघरे में खड़ा किया है. यह एक अनूठा कार्य है| वे सभी को ललकारते हुए कहती है- ” जन्मदात्री हूँ / बेटी भी मैं जनूंगी / रोकेगा कौन? ” कवियत्री एक सामान्य नारी को उसकी वास्तविक शक्ति से परिचित कराना चाहती है, इसी को लक्षित कर वे लिखती हैं –“आग का गुण / केवल जलना नहीं / जलाना भी है”. यहाँ लक्षणा शब्दशक्ति से ‘आग’ शब्द यहाँ नारी के वाच्यार्थ में ही आया है,निश्चित रूप से सामाजिक विद्रूपताओं, अंधविश्वासों, कुरीतियों और व्यापारवाद की चक्की में पिस-रहा, घुट-रहा, जल-रहा, नारी-मन ही आग की संज्ञा से संबोधित है- “आत्मा की दूर्वा / जल रही आग में / देह ईंधन”/ लेकिन यह संबोधन एवं आह्वान अंततः ध्वन्स्यात्मक नहीं, सृजनात्मक है| यह चेतावनी उनके लिए है जो प्यार, अनुग्रह, आग्रह और युक्ति-तर्क को भी नकार देते हैं| जो सुनने, समझने और मनन को तैयार हैं उनके लिए कवियत्री का स्वर संयम, युक्ति और तर्क से संयुक्त है| वे प्यार से समझाती हैं –“स्त्री भ्रूण हत्या / बिगड़ा संतुलन / सृष्टि का नाश”, फिर तर्क करती हैं – “बिगड़ेगा जो / सृष्टि का संतुलन / ब्याहोगे किसे”?

कवियत्री की एक अनूठी विशेषता यह भी है कि वह केवल समाज से ही वार्तालाप नहीं करतीं; वह गर्भस्थ-भ्रूण (शिशु) से भी वार्तालाप करती है और इसी बहाने नारी विवशता तथा आक्रोश को रेखांकित करती है. गर्भस्थ कन्या-भ्रूण माँ से कहती है – “संहार मत / अपने स्वरुप को / माँ आने भी दो”. प्रत्युत्तर में माँ तड़पकर, आहत होकर असहाय सी अपनी वेदना प्रकट करती है – “गर्भ सुरक्षा / दे सकती हूँ बेटी / बाहर नहीं” जानती हो क्यों? क्योकि बाहर तेरा सबसे बड़ा शत्रु तो वही है, जिसका तू अंश है -“जीवनदाता / बन गया राक्षस / सुरक्षा कहाँ?”. इस विवशता पर पतिपरमेश्वर का ‘अविरोध करने की परंपरागत मान्यताओं की बेड़ियों में जकड़ी एक पत्नी’, एक माँ के रूप में, एक आज्ञाकारी कुलवधू के रूप में कर ही क्या सकती है, आंसू बहाने के अतिरिक्त – “चंद कतरे / टपक कर गिरे / क्या क्या न कहें ?”. माँ की सारी विवशता समझ जाती है वह गर्भस्थ-कन्या और इस सामाजिक कुपरम्परा के सर्वनाश का तत्क्षण ही संकल्प लेती है और माँ को भी अनुप्रेरित करती है, उसके अंतर की सुप्त नारी-अस्मिता को जागृत करती है, इस कुव्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह और विनाश का आह्वान करती है- ‘भेदना होगा / दुष्टों का कुचक्र / चंडी बन के’. माँ तुमने बहुत सह लिया अब तक, अब चुप न बैठो, माँ तुम “चुप न बैठो / काली कपाली बन / करो संहार”

यहाँ जब ‘संहार’ शब्द पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि यह ‘संहार’ शब्द डरावना अवश्य है लेकिन यह समाज का संहार नहीं है, यह बुराइयों का संहार है. इस संकल्प को माँ यदि पूरा न कर सकी तो गर्भस्थ कन्या, बेटी – वधू – माँ और सासू-माँ बनकर अपना यह संकल्प पूर्ण करेगी, इसलिए वह बलपूर्वक माँ से कहती है – तू चंडी बन जा, काली बन जा, कपाली बन जा, विद्रोहिणी बन जा और जन्म दे मुझे तू मुझे केवल अस्त्तित्वमान बना दे माँ! शेष कार्य तो मैं पूरा करूंगी. मेरा यह अनुरोध स्वीकार लो माँ, इसलिए पुनः कहती हूँ – “संहार मत / अपने स्वरुप को / माँ आने भी दो”. विद्रोह की सी इस पृष्ठभूमि और तानाबाना में यह तेवर एक स्वस्थ समाज, शोधित समाज, प्रगतिशील समाज की संरचना का सृजनात्मक स्वर, आशावाद की झलक और परिवर्तन की रूप-रेखा है, यह प्रगतिशीलता है, जड़ता नहीं, इस आधार पर कवियत्री को प्रगतिशील विचारधारा का पोषक कहना उचित होगा, पोषक ही क्यों? इसमें तो नेतृत्व की तेजस्वी-ऊर्जा भरी पड़ी है किन्तु प्रतिक्रिया और विद्रोह का यह स्वरुप पाश्चात्य ‘नारी मुक्ति आन्दोलन’ की छाया से पूरी तरह मुक्त है|

कवियत्री पाश्चात्य सभ्यता और अस्त्तित्ववादी विचारकों की तरह समाज स्वीकृत , संस्कृति अनुमोदित ‘विवाह संस्था’ जैसे नियामक स्वरुप को नकारती नहीं, स्वच्छंदता को, निर्ल्लजता को, तलाक को अपनाने की सलाह नहीं देती, वे विवाह और दाम्पत्य को, इसके अर्थ को स्पष्ट करती है, दाम्पत्य में मधुरता और समरसता की बात करती है. वे कहती हैं कि विवाह मात्र दाम्पत्य कुंडली का मेल नहीं है, यह तो विचारों और संस्कारों का मेल है, यदि विचारों में सामी नहीं तो यह निरर्थक है – ‘कुंडली मिली / शहनाई की गूंज / करम जली” करम क्यों जली? क्योकि विचार और संस्कारों में मेल नहीं. यदि विचार नहीं मिले, संस्कार नहीं मिले तो भाग्य को दोष न दो. आपसी संबंधों को, विवादों को, समझदारी से सुलझा लो क्योकि – “समीकरण / टिका है संबंधों का / समझ पर”. वे सुझाव देती हैं, फूल बन जा और सौहार्द्रपूर्ण दाम्पत्य जीवन की रचना करो| जरा देख तो सही- “फूलों ने रचा / बूंदों के सौन्दर्य से / काव्य नवीन”. इसलिए तू भी रच एक नया जीवन, कटुता भुलाकर. विवाह पाश्चात्य सभ्यता की तरह कोई समझौता नहीं है, इसकी परिणति तनाव और तलाक नहीं है| भारतीय संस्कृति में यह स्वीकृत नहीं है. यह तो पाश्चात्य सभ्यता है जहाँ – ‘शादी रचा ली / माडर्न समझौता / खतरे भरी”. वैवाहिक सुख-शान्ति के लिए अपनी संस्कृति के अन्दर अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करना पड़ता है- “खुद ही खोजो / कोई न बतायेगा / जीने की राह” लेकिन राह जीने की खोजो, मरने और मारने की नहीं, तलाक और परित्याग की नही| हाथ की बदसूरत लकीरें बदली जा सकती हैं समझ से, विवेक से, श्रम से| जानते हो- “मेहनत से / बदली है उसने / भाग्य रेखाएं’. सुखी-समृद्धशाली जीवन का आधार समझ और श्रम है, कुंडली और मंत्रोचारण नहीं – “मंत्रोच्चारण / विवाह का आधार / है निराधार”/ इस रूप में वे कोरा अंधविश्वास का विरोध करती है लेकिन मर्यादा के सन्दर्भ में वे नारी के लिए लज्जा, आँचल, चौखट जैसी स्थापित मान्यताओं का समर्थन भी करती हैं| तन-बदन के प्रदर्शन को समाज के लिए घातक मानती हैं, उसकी कटु आलोचना करती है- “उघडा तन / आधुनिक फैशन / यश की सीढी”/ यश के लिए इस प्रकार के शार्टकट का विरोध करती हैं वे, क्योकि इस शार्टकट में, सुन्दर दिखनेवाले तन में घातक विष भरा है – “सुन्दर तन / कनक घट विष / मलिन मन”/ उनके अनुसार नारी समाज के लिए आँचल और चौखट का महत्व सदा से रहा है, यह जितना महत्वपूर्ण कल था, उतना ही प्रासंगिक आज भी है| इस प्रासंगिकता को रेखांकित करती हैं अपनी रचना “रेत का समंदर” में | वे लिखती हैं – “दहलीज एक गतिरोध भर नहीं / यह पहचान है / उस घर की सीमाओं की / मर्यादाओं की / संस्कारों की / सुरक्षा की / आत्मीयता की/ यह वरदान भी है, गुमान भी है / और कभी कभी अभिशाप भी / आधुनिक घरों में नहीं रही दहलीज की परंपरा / इसलिए न कोई मर्यादाएं हैं / न जीवन आचरण के मूल्य / और नई पीढ़ी दिग्भ्रमित हो भटक रही है / मूल्यहीनता की दिशा मे”| उन्हें मानवीय मूल्यों से प्यार है, निजता (जता) से कवियत्री लड़ना चाहती है, वह लड़ेगी भी लेकिन प्रगतिशीलता के नाम पर पारम्परिक मूल्यों को त्याग कर नहीं| उनकी प्रगतिशील नारी कुरीतियों से लड़ेगी, अंधविश्वास से लोहा लेगी, वैज्ञानिक शोधों को, उसके निष्कर्षों को मान्यता देगी, जीवन में स्वीकार भी करेगी, लेकिन आवरणहीन और आचरणहीन होकर नहीं| पति अब उनके लिए परमेश्वर भले ही न रहा हो, वह त्याज्य नहीं है| आपसी कटुता का इलाज तलाक नहीं है| तलाक और सम्बन्ध विच्छेद से यथासंभव बचना चाहिए क्योकि इससे सामाजिक विकृति बढ़ेगी, यौन विकार और व्यभिचार बढेगा, इसलिए पाश्चात्य परंपरा का विरोध करते हुए वे आश्चर्य प्रकट करती हैं – “कैसी ये सोच / पति को फटकार / कुत्ते से प्यार” वे दाम्पत्य जीवन में सौहार्द्र और समरसता चाहती है. इस प्रकार के समझबूझ वाले दम्पतियों के संयुक्त प्रयास से ही सामाजिक विकृतियों को मिटाना चाहती है और इस अभियान में अपनी संतान को भी सम्मिलित रखना चाहती हैं| सम्वेदनहीन संतान की प्रतिगामी सोच को कोसते हुए उसे नैतिकता – सामाजिकता और उत्तरदायित्व का पाठ पढ़ाना चाहती है, इस क्रम में एक संतान की प्रथम जिम्मेदार ‘माँ’ और ‘मातृभूमि’ से बढ़कर क्या हो सकती है? वह ‘माँ’ जो देवों की भी देव है, जो त्रिदेवों की जननी है, आदि शक्ति है, जन्मदात्री है, जन्मभूमि है…. उसकी उपेक्षा पर वे चिंतित है – ” अजब बात / माँ को न पाल सके / उसके लाल”. वे सीख देतीं है बच्चों को कि – “स्वर्ग है कहीं / माँ के ही चरणीं में / ढूंढो तो सही”/

समाज और संतान के इस दायित्वहीनता की स्थिति पर कवियत्री चुटीला व्यग्य करती हैं – ” कैसा समाज / तार – तार अस्मिता / देश महान”/ उन्हें लगता है की नारी शक्ति ही अब नारी-अस्मिता और मातृभूमि की, उसकी गरिमा की रक्षा कर पायेगी; तभी तो कहती है – “बढा अधर्म / पीयेगी रक्त काली / रक्तबीज का”/ यहाँ ‘काली’ कोई और नहीं नारी शक्ति ही है. आस्तिक विचारधारा की पोषिका होने के कारण ईश्वरीय शक्ति पर भी उनकी पूर्ण आस्था और विश्वास है, यही आशा, यही विश्वास मन में सुधारात्मक और नवसृजन की आस भी जगाये हुए है. गीता के उद्घोष -“यदा यदा ही धर्मस्य ” और मानस के आश्वासन -” जब जब होहि धरम की हानी बाढे असुर अधम अभिमानी ….” पर अटूट विश्वास है, तभी तो कह पाती हैं दावे के साथ -“पाप का घडा / भरेगा एक दिन / होगा विस्फोट”.

यह तो रहा कवियत्री के बहुआयामी व्यक्त्तित्व का केवल एक पक्ष. सम्वेदनशीलता और भावनाओं का एक सुदृढ़ पक्ष वह भी है जब उनके अंतर की दार्शनिकता प्रेम और आह्लाद बनकर सैद्धांतिक पुट धारण करती है और अध्यात्म के रूप में अभिव्यक्ति पाती है| उपनिषद चिंतन की गहरी छाप उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त है| इस उपनिषद् सिद्धांत कि प्रारंभ में ‘ब्रह्म’ अकेला था, उसने अपना द्विधा विभाजन किया, दाल के दो दानों की तरह बराबर – बराबर. जिससे पुरुष और नारी, पति और पत्नी का आविर्भाव हुआ. एक के बिना दूसरा अपूर्ण है| रमा जी इस सिद्धांत को स्वीकार करती हैं – “राधा औ श्याम / एक ही तत्व के हैं / पृथक नाम”. ये पृथक हैं अतएव अधूरे हैं, पूर्णता के लिए प्यासे हैं, इस पूर्णता के लिए ही ये गतिशील हैं – “ढूढती फिरे / कान्हा को कुञ्ज-कुञ्ज / मीरा बावरी”. इस मिलन में ही पूर्णता है, महाआनंद है – “प्रेम दीवानी / श्याम में डूब गयी / बनी कहानी” और यह कहानी विभिन्न रूपों में, भिन्न-भिन्न प्रतीकों में पायी जाती है, गायी जाती है; विश्व की सभी संस्कृतियों में, सभी धर्मों और जातियों में | केवल विकसित समाज में ही नहीं, आदिम जातियों में भी|

भारतीय संस्कृति में प्रेम का यह रंग कुछ ज्यादा ही गाढ़ा है जहाँ प्रेम की वंशी की सुमधुर धुन में जड़-चेतन सभी सुधि-बुद्धि खोकर मगन हैं – “जड – चेतन / कान्हा वंशी सुन / झूमें मगन”. प्रेम की यह प्यास, उमंग के अतिरेक में भी बुझती नहीं, पता नहीं कैसी है यह प्यास जो बुझती ही नहीं -“बुझती नहीं / प्रेम की कैसी प्यास / श्याम ही जाने”/ श्याम तो जानते ही हैं और प्रतीकों से बतलाते भी है – बन जा बंशी, बन जा बान्सुरी … बांसुरी ही क्यों? क्योंकि श्याम तक पहुँचने के लिए श्याम की मनोभाओं को उसने पहचाना है, अपनी बुराइयों का परित्याग किया है, जप-तप की पीड़ा सही है. अंतर्मन में लक्ष्य का निर्धारण किया है -“कृष्ण से मिलूँ / सही छेदन पीड़ा / अधर सजी”. यदि प्यार निश्छल है, पवित्र है, एकनिष्ठ हैं तो इस अध्यात्म में भौतिकता भी कभी बाधक नहीं बनती| बंशी का छिद्र का होना, एक कमी है बांस का टुकड़े की, लेकिन यह कमी ही सौभाग्य बन जाती है समर्पित के लिए – “छेदित वस्तु / प्रायः ही होती त्याज्य / वंशी सौभाग्य”/ सौभाग्य के इस सुदृढ़ आधार को समझ पाता है केवल और केवल एकनिष्ठ समर्पित प्रेमी ही, कोई दूसरा नहीं – “समझे नहीं / जीवन का रहस्य / ज्ञानी -ध्यानी भी”. ऐसा क्यों? क्योंकि उनके अन्दर अभिमान है – मैं ज्ञानी, मैं ध्यानी, मैं वैज्ञानिक, मैं नेता, मैं अभिनेता … जबतक यह अहंकार न छूटे, मैं न टूटे, तबतक कैसे हो पायेगा स्वमूल्यांकन? इसी तथ्य को कवियत्री ने रेखांकित किया है इस प्रकार – “कैसे करता / ‘मैं’, ‘मैं’ मूल्यांकन / ‘मैं’ न छूटता”. और चिंतन के इस सर्वोच्च विन्दु पर आकर कवियत्री की वाणी मौन हो जाना चाहती है| अब वह इसके आगे कहे भी तो क्या और कैसे? वाणी तो अब अपनी असमर्थता व्यक्त करती है, अनुभूति अब अकथ्य है, इसके आगे की भाषा तो अब मौन ही हो सकती है| अतएव कवियत्री अब मौन रहकर संकेतों और प्रतीकों के सहारे अपनी संवेदना प्रकट करती हैं – “होती हैं बातें / मौन रहकर भी / बोलती आँखें”| अब बारी हमारी-आप की है, इस मौन को, इन संकेतों को पढ़ पाने की| इन संकेतों को कितना समझ पाते हैं, हम आप? इस मौन में जो जितना गोता लगाएगा, उतना ही बहुमूल्य मोती पायेगा, इसमें संदेह नहीं |
.
अब यदि इस हाइकु संग्रह को भाषा-शैली और शिल्प की दृष्टि से देखा जाय तो डॉ. रमा द्विवेदी के लेखन में कई चिंतकों, रचनाकारों, कवियों का सीधा प्रभाव नजर आता है| जब वे अंधविश्वास और कुप्रवृत्तियों पर पर चोट करती हैं तो कबीर की सी भाव-भंगिमा उनकी शैली में अनायास ही आ जाती है और कवियत्री ने इसे छिपाने का कभी प्रयास भी नहीं किया| कबीर की शिक्षाओं के बावजूद समाज द्वारा अभी भी मैली चादर ओढने पर उनके मन का कबीर अत्यंत दुखी है –“मैली चादर / ओढ़ रहा संसार / कबीर रोये”. यहाँ कबीर की अभिव्यक्ति और प्रतीकों को सीधे-सीधे अंगीकार कर लिया गया. कबीर शैली का सीधा प्रभाव वहाँ भी दीख पड़ता है, जब “कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ’ के अंदाज में वे कहतीं हैं – “जन्मदात्री हूँ / बेटी भी मैं जनूंगी / रोकेगा कौन?” तो इसका आशय और निहितार्थ यही है कि जिसे इस सिद्धांत में विश्वास हो, इस सोचरुपी मशाल को हाथ मे लेकर हमारा साथ दें और इसकी शुरुआत अपने घर से करे, मिटा दें बेटे -बेटी का भेद| इस प्रकार छायावादी शैली का प्रभाव वहाँ पर है जब वे प्रकृति का चित्रण करती, उनके भाव और शब्दावली ठीक वैसी ही लगती हैं जैसी छायावादी अभिव्यक्तियों की छूट गयी कड़ियाँ ही हो. ‘प्रसाद जी’ की प्रसिद्द रचना जिसमें वे प्रकृति-वधु को नींद से जगाते हैं-“ बीती विभावरी जाग री, पनघट डुबो रही उषा घट नागरी …”. इस रचना की अगली कड़ी सी लगती है| रमा जी की यह हाइकु -” प्रकृति वधु / अलसाई सी उठी / अलस भोर” तथा “मनभावन / अलसाई भोर में /प्रकृति वधू “. जैसी रचनाएँ . इसी प्रकार जब वे लिखतीं हैं – “छू गया झोंका / मलय अनिल सा / खुशबू भरा” अथवा “ढीठ समीर / मन चला सा बहे / आँचल उड़े” तो लगता है कि ये पंक्तियाँ ‘निराला जी’ की “जूही की कली ” में से छूटी हुई पंक्तियाँ है इसी प्रकार – “धूप में बैठ / पत्थर तोडती वो / उफ़ न करे” को पढ़ते वक्त निराला की कविता ‘वह तोडती पत्थर’ की स्मृति मानस पटल पर बरबस छा जाती है| इस क्रम में महादेवी की कारुणिक रचनाएं साक्षात दीखने सी लगती हैं, जब रमा जी करुना में डूबकर लिखती हैं – “वेदना पाती / वेदना ही मैं गाती / तुम्हें लौटाती ‘’/उनकी सबसे बड़ी वेदना है” – “जिन्दा लाश सी / दफना दी जाती जो / ब्याहता है वो !आह ” आज यह कैसी विडम्बना – ” सभ्य इंसान / असभ्य हरकतें / युग का सच” और युग के इस कटु सत्य को अनुभूत करते, गाते-गुनगुनाते कब वो अपने व्यक्त्तित्व को लिख गयीं? कब अपनी छटा और छाप छोड़ गयीं? उन्हें स्वयं ही नहीं पता, क्योंकि वे तो बस मगन हैं – साँसों की सरगम सुनने में, लिखने में – “सुनती रहूँ / साँसों की सरगम / लिखती रहूँ”. अंत में यह कहने में मुझे झिझक नहीं कि लेखिका भले ही कहें कि यह उनके साँसों की सरगम है, समीक्षक तो कहेगा कि ‘यह उनके व्यक्त्तित्व का निर्मल दर्पण है’ जो प्रगतिशीलता और परम्परागत दोनों की अतियों को नकारता हुआ, दोनों के गुणों को स्वीकार कर मध्यमार्ग का एक संतुलित आदर्श समाज और संसार के समक्ष प्रस्तुत करता है.

कुछ लोग कह सकते हैं कि उनकी विचारधारा में परंपरागत प्राचीन परम्पराओं का समर्थन भी दीखता है और आधुनिक प्रगतिशीलता का भी, क्या यह भटकाव और चिंतन-दोष नहीं है? उत्तर है – नही, क्योकि कवियत्री उपादेयता की पोषक है, नवीन और पुरातन की नहीं। उनकी प्रवृत्ति सारग्राही है, मधु संचयी है| इस मधु के लिए पराग चाहे गुलाब से मिले या चंपा-चमेली अथवा गेंदा-गुलदाउदी से, उन्हें इससे कोई विरोध नहीं, उपादेयता उन्हें प्यारी है, मानवता उन्हें प्यारी है, शांति उन्हें प्यारी है, मानवीय मूल्य प्यारे हैं , चाहे वह पुरातन में मिले या नवीन में | उनका एक मात्र सिद्धांत मधु संचय का ही है | यदि कभी इस मधु को समाज खारा समझ ले या खारा बना ही दे तो इसमें उनका क्या दोष – “मधु-ही-मधु / समंदर से मिली / खारी हो गयी”/ इस प्रकार रमा जी की शैली विषय-वस्तु के अनुरूप परिवर्तनशील है| वे किसी एक शैली में बंधना भी नहीं चाहती| अनुभूति जिस ओर प्रेरित करती है, उसी ओर सहज गमन से कवियत्री को विरोध भी नहीं| भाषा एवं भाव शब्दों के साथ संगति मिलाकर भावार्थ का सम्प्रेषण करतें हैं| कवियत्री का झुकाव किसी एक भाषा तक सीमित होकर नहीं रहा| जिस भाषा के शब्द अर्थ-निहितार्थ को अधिक स्पष्ट कर सके और जो प्रचलन में हो, उसीको सहज भाव से स्वीकार किया है और इसका परिणाम यह हुआ है कि शब्द चाहे किसी भाषा के हों थोपे हुए प्रतीत नहीं होते| यह सहजता ही हाइकु को एक अतिरिक्त शक्ति प्रदान करती है और कथ्य की उपादेयता बढ़ा देती है| इस संग्रह का मुद्रण एवं रंग-रूप स्पष्ट-स्वच्छ है तो कवर पेज आकर्षक जिसके लिए प्रकाशक भी बधाई का पात्र है| बढती हुई महंगाई के दृष्टिगत पुस्तक का मूल्य भी न्यायसंगत ही है|

डॉ. जय प्रकाश तिवारी
भरसर, बलिया, उत्तर प्रदेश

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

श्रेणी

%d bloggers like this: