Posted by: ramadwivedi | मई 12, 2014

भावनाएँ बर्फ़ बन गईं

अनुभूति कलश

  मानव की भावनाएँ आज बर्फ़ बन गईं
 ज़िन्दगी की हर खुशी बस दर्द बन गईं।  
 
मीठा जहर पिला रहा मानव को मानव आज,
  प्रतिशोध की आग में सब जर्द बन गईं । 
  
इन्सानियत को ढूँढ़ते सदियाँ गुजर गईं, 
 इंसा को इंसा डस रहा बस सर्प बन गईं ।
 
हर खुशी का लम्हा है दहशत भरा हुआ
  ज़िन्दगी की धड़कनें बस सर्द बन गईं।
 
 विश्वास भी तो जल गया नफ़रत की आग में,
 इंसान की हर ख़्वाहिशें बेदर्द बन गईं।
 
डा.. रमा द्विवेदी  
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Responses

  1. bahut khoob rama ji…..badhai

  2. shukriya Jyotsana Pradeep ji


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