Posted by: ramadwivedi | अक्टूबर 11, 2014

चिर-आयु पति की और अपनी मृत्यु की कामना?

अभी-अभी किसी ने मुझे करवा चौथ के शुभ अवसर पर “सदा सुहागन रहो” की शुभ कामनाएं भेजीं जिसे पढ़कर मेरे मन में एक विचार कौंधा कि भारतीय स्त्रियां कितनी भोली हैं या कितनी महान हैं या कितनी उदार हैं या फिर यह भी कह सकते हैं कि उन्हें खुद पता नहीं कि उन्हें क्या चाहिए ? पति की लंबी आयु चाहिए या उससे मिलने वाली सुख-सुविधाएं या दोनों? यदि ये दोनों भी चाहिए तो उसके लिए उनका भी चिर-आयु होना आवश्यक है।क्या स्त्रियों को ऐसा नहीं लगता कि जाने-अनजाने वे अपनी जल्दी मृत्यु की कामना कर रहीं हैं । आश्चर्य की बात है कि जब संसार का हर प्राणी अपने सुख की कामना करता है और उसकी हर कोशिश अपने सुख की तलाश ही है और इक्कीसवीं सदी में भी महिलाएं जब अपने अधिकार और स्वतंत्र अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं है वहीं स्त्रियों का एक बड़ा वर्ग अपने अस्तित्व की रक्षा तो दूर अपने आप को इतना कमजोर महसूस कर रहा है कि अपने अस्तित्व को सिर्फ पति पर ही निर्भर मानती हैं इसलिए ही तो “करवा चौथ” का व्रत करके अपने पति की लम्बी आयु की कामना करती हैं । सवाल यह भी है कि क्या सृष्टि के संतुलन बनाए रखने के लिए क्या सिर्फ पुरुष की ही ज़रूरत है? क्या पुरुष के जीवन का ही महत्व है ? अगर ऐसा है तभी तो स्त्री भ्रूण-हत्या की जा रही है। इन्हीं सब धार्मिक अंध विश्वासों के कारण ही तो स्त्री पर अत्याचार होते हैं और स्त्रियां जाने-अनजाने उन्हें खुद स्वीकृति देती हैं। किसी की भी आयु का संबंध पूजा-व्रत आदि से नहीं होता यह सब स्त्रियों की भावनाओं को कमजोर बनाने के माध्यम हैं इससे ज्यादा कुछ नहीं । आप खुद सोचिए कि क्या दुनिया भर की स्त्रियां जो यह व्रत नहीं करतीं क्या उनके पति की मृत्यु शीघ्र हो जाती है नहीं ना? तो अपने मन से यह डर निकाल दीजिए कि कोई भी व्रत किसी को भी लंबी आयु दे सकता है ।मैंने यहाँ अमेरिका में ही देखा है कि नई नवेली दुल्हन के हाथ में न कंगन है न बिंदिया न सिन्दुर न बिछुवा लगता ही नहीं कि वह शादी-शुदा है ।कहने की ज़रूरत नहीं कि भारतीय स्त्रियों के ये सब सुहागन के प्रतीक हैं । परिवर्तन इतनी तेजी से आ रहा है कि भारतीय संस्कृति की धज्जियाँ उड़ रहीं हैं फिर भी भारतीय स्त्रियाँ महान हैं का झूठा दम भर रहीं हैं। अच्छे के लिए बदलना बहुत अच्छी बात है लेकिन सुविधा के लिए बदलने का तो कोई अर्थ नहीं होता ।बात तो तब है जब हम दुनिया के किसी संस्कृति एवं सभ्यता के साथ रहें अपनी संस्कृति के साथ जिएं और मरें।बहुत कठिन है ऐसा कर पाना लेकिन असंभव कुछ भी नहीं।सबसे जरुरी बात तो यह है कि हम अपने जीवन साथी के प्रति ईमानदार सोच रखें और जीवन को सुखमय बनाने का बस हमें यही मूल मंत्र याद रखना चाहिए ।
( किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना इस लेख का उद्देश्य नहीं बस यह मेरा विचार भर है)
-डॉ रमा द्विवेदी

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Responses

  1. Reblogged this on oshriradhekrishnabole and commented:
    हमने जिस आगॅन में जन्म लिया और जो माॅ ने सिखाया बस उससे दो चार अक्षर और सीखा और जिन्दगी लम्बा सफर थम थम कर चल रहा, ,हम आत्मज्ञानी ,, ,,

  2. sahi kah rahe hai aap ,,,,agyanata kai peedaon ko janm deti hai ,,,,,


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