Posted by: ramadwivedi | जून 25, 2015

पृथक सत्ता ही प्यारी है -ताजा गीत

प्रकृति के रूप को देखो कहाँ संग नर औ नारी है
मिलन होता है क्षण भर का पृथक सत्ता ही प्यारी है ।

कही है चाँद का आसन ,कहीं चंदा विचरती है
कहीं बादल बरसते हैं कहीं जा मिलता पानी है ।

चमन के फूलों को देखो हजारों रंग में खिलते हैं
कही भौंरे मचलते हैं , कहीं तितली दीवानी है ।

नदी उदगम से चल करके कहाँ -कहाँ से गुजरती है
समां कर वो समंदर में पुन : रचती कहानी है ।

सुबह सूरज निकलता है कहाँ-कहाँ वो भटकता है
कहाँ जगता ,कहाँ सोता न जाने कौन नारी है ।

धरा और आसमां देखो सदा सीमा में रहते है ?
जहाँ घुसपैठ होती है , वहीँ संघर्ष जारी है ।

नदी के दो किनारे भी नहीं आपस टकराते
जहां सत्ताएं टकरातीं , वहीँ पे मारामारी है ।

प्रकृति की अपनी निजता है नहीं करते हैं तू -तू मैं
जहां पर प्रेम बसता है ,घृणा भी उससे भारी है ।

डॉ रमा द्विवेदी

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Responses

  1. प्रकृति से ओतप्रोत बहुत सुन्दर गीत ,आपको बहुत बहुत बधाई ।

  2. बहुत -बहुत हार्दिक आभार रेनू चंद्रा जी

  3. बहुत -बहुत हार्दिक आभार oshrivastava ji


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