Posted by: ramadwivedi | मार्च 28, 2016

होली पर दो ताजा- मुक्तक

1- नखरीली नार आ  गई  प्रेम  रंग रस घोली है

रंगरसिया की धूम मची  बुरा न  मानो होली है

रंगों का सुरूर चढ़ा यूँ  सबहिं करत बरजोरी है

मर्यादा की परिधि  टूट गई  ब्याही हो या कोरी है।
             *****************
2-सबके तन -मन भीग गए हैं  छोरा हो या छोरी है
जड़ -चेतन  सुध-बुध भूले मन की हो गई चोरी है
 बच्चे ,बूढ़े ,जवान खेलते, कारी हो या गोरी है
अधिकारी अधिकार हुए सम तोरी है न  मोरी है ।
डॉ रमा द्विवेदी
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