Posted by: ramadwivedi | जून 17, 2016

लक्ष्मी की माया -लघुकथा

“नमस्ते लक्ष्मी ! किधर जा रही हो ?”
“बस संस्था के काम से जा रही हूँ लक्ष्मी ने विद्या से कहा ।”
“विद्या ने कहा ,अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछू ”?
“हाँ हाँ पूछो ”।
“विद्या ने कहा ,सखी  तुम्हारी संस्था `साहित्य सेवा  ‘  का तो बड़ा नाम है ,लोग चुम्बक की तरह खिंचे  चले आते हैं ”।
“लक्ष्मी कुटिलता से मुस्काई ”।
 “मैं भी एक संस्था `जन कल्याण ‘ चलाती हूँ ,पर बहुत कम लोग आते हैं जबकि मैं ईमानदारी से जनहित में ही काम करती हूँ । संस्था चलाने के मुझे भी अपने कुछ गुर बतलाओ ,विद्या  ने पूछा ”।
“लक्ष्मी कुटिलता से मुस्का कर बोली – `ईमानदारी ‘,`जनहित ,’ `समाज सेवा ‘,`साहित्य सेवा ‘ ये शब्द अब आडम्बर मात्र हैं  इनसे  कोई नाम -दाम -यश नहीं पा सकता” ।
“विद्या बोली -फिर क्या करना चाहिए ?”
“लक्ष्मी ने कहा – “लक्ष्मी का वाहन धनाढ्य उल्लुओं को पकड़ो  जो कार्यक्रम करने के लिए  मोटी  धनराशि अनुदान दें । बस उन्हें मंच पर बिठाओ ।  एक शॉल -माला पहनाओ , दो चार शब्द में उनके गुण गाओ और दो इंच की मुस्कान दिखाओ। बस मनवांछित फल पाओ ” ।
“ विद्या अवाक देखती रह गई”।
डॉ रमा द्विवेदी
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