Posted by: ramadwivedi | अगस्त 4, 2016

धंधा -लघुकथा

डॉ विद्दोतमा को घनिष्ठ परिचित और प्रतिष्ठित लेखिका `मधुरिमा’  का  फोन आया ।
विद्दोतमा तुमसे एक बात कहनी है-“ समझ नहीं आ रहा कि कहूँ  या न कहूँ” ।
विद्दोतमा ने कहा -“ऐसी क्या बात है जो आपको कहने में इतना संकोच हो रहा है ”।
 मधुरिमा  ने कहा – तुम बहुत सिद्धांतवादी हो न ? तुम्हें कभी ऐसे काम करते नहीं सुना।
विद्दोतमा ने औपचारिकता वश ही कहा -“कहिये तो सही”
 मधुरिमा  ने कहा -“ एक पी एच डी  की थीसिस लिखनी है , तुम जो मेहनताना मांगोगी मिलेगा ”।
विद्दोतमा को इस  अप्रत्याशित प्रस्ताव की कल्पना नहीं थी ,“ उसने संयत स्वर में इतना ही कहा मैं यह `धंधा’ नहीं करती ”।
डॉ रमा द्विवेदी
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