Posted by: ramadwivedi | जुलाई 22, 2017

कन्हैया मुझ को भाता  है -मुक्तक 

 घुँघराले  केशवाला वो  कन्हैया मुझ को भाता  है
सुशोभित अधरों  पे मुरली  प्रेम के गीत  गाता है
हों जड़ -चेतन सभी तन्मय ,सभी आनंद को पा लें
प्रेम ही प्रेम  चहुँदिशि हो , यही सबको बताता  है |
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वो काले केशों  पर देखो  मोरपंखी लगाता है
वो देता मान जीवों को ,सभी से उसका नाता है
प्रेम- स्थापना  करने  सदा आता धरा पर वो
सदा बंशी बजा कर वो , प्रेम -उत्सव  मनाता है |
** डॉ. रमा द्विवेदी **
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