Posted by: ramadwivedi | अगस्त 8, 2017

लोभी गुरु ,लालची चेला -लघु कथा 

 

“सुचित्रा आजकल हमेशा ऑनलाइन रहती हो ,क्या करती रहती हो ”?
“हाँ साधना ! मैं कविता लिखना सीख रही हूँ | कविता की इतनी  सारी  विधाएँ  हैं  और  उससे भी अधिक गुरु हैं  | सबसे सीखने में समय लगता है | कोई ऐसा बताता है ,कोई कैसा बताता है | कोई इनबॉक्स में दौड़ा चला आता है और  कहता है मैं आपको लिखना सिखाऊंगा और मैं फिर उस ओर आकर्षित हो जाती हूँ | आखिर मुझे भी तो गुरु ही बनना है वह भी रातों रात ताकि मेरे भी चेले बने और मैं प्रसिद्द हो जाऊं” |
“क्या ! तुम भी गुरु बनना चाहती हो ? भला इतना लोभ क्यों ”?
 “अरे साधना ! तुम्हें पता नहीं , आजकल का यही ट्रेंड  है | गुरु बनो और चेले बनाओ ,मुफ्त में नाम कमाओ | आभासी दुनिया में गुरु -चेला का खेल मुफ्त है ,इसलिए इस खेल में सभी शामिल होना चाहते हैं | नो गुरु दक्षिणा ”|
सुचित्रा सच बताओ -“क्या वे चेले सच में गुरु का सम्मान करते हैं ”?
सुचित्रा  “नहीं करते क्योंकि  वे भी गुरु बन जाते हैं ”|
साधना -धन्य हो `लोभी गुरु ,लालची चेला ,पड़ें नरक में ठेली  ठेला ”|
*** डॉ रमा द्विवेदी ***
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