Posted by: ramadwivedi | अप्रैल 3, 2019

मानसिक शांति -लघुकथा

“प्रणीता तुमने ऐसे आदमी से शादी क्यों कर ली जब तुम्हें शादी से कुछ घंटे पहले ही यह पता चल चुका था कि उसे `स्नायु कंपन’ (parkinson’s desease ) की लाइलाज बीमारी है ”? मैंने अपनी सहकर्मी से पूछा |
“ कुछ विवशताएँ थीं जिसके कारण मैंने यह शादी कर ली ”| प्रणीता ने कहा |
“ ऐसी भी क्या विवशता थी कि तुमने जानबूझ कर पूरी ज़िंदगी भर का दर्द स्वीकार कर लिया ”| मैंने पूछा |
“ मैं नर्क से मुक्ति पाना चाहती थी ”| प्रणीता ने कहा |
“ कैसा नर्क ? तुम तो अपने भैया -भाभी और माँ के साथ रहती थीं और नौकरी भी तो करके अपनी आमदनी घर को देती थीं | सच -सच बताओ ऐसा क्या गम था जिसने तुम्हें इतना कठिन निर्णय लेने के मजबूर कर दिया ”| मैंने पूछा |
“ पिता जी के गुजरने के बाद मैं और मेरी माँ भाभी को बोझ लगने लगे थे | वह हर रोज कलह करती और हम दोंनो को अपशब्द बोल -बोल कर बहुत ही अपमानित करती | दहेज़ देने की सामर्थ्य मेरे भाई में नहीं थी इसलिए मेरी शादी नहीं हो पा रही थी और शादी की उम्र भी निकली जा रही थी | मैं रोज -रोज की कलह से बहुत तंग आ गई थी इसलिए मैंने मानसिक और शारीरिक रूप से अस्वस्थ्य व्यक्ति से विवाह कर लिया | कम से कम मुझे उस नर्क से तो मुक्ति मिल गई | अब जीवन में शांति है क्योंकि पति शारीरिक रूप से असमर्थ अवश्य है लेकिन दिल से अच्छा इंसान है |अब मैं अपने जीवन और अपने घर की स्वयं मालकिन हूँ| `मानसिक शांति’ की उपलब्धि कुछ कम तो नहीं होती ”?
“ धन्य हो प्रणीता ! कुंवारी पत्नी रहकर भी तुमने जीवन को सोचने -समझने की एक नई दृष्टि प्रदान की ”| मैंने कहा |

**डॉ. रमा द्विवेदी **

@सर्वाधिकार सुरक्षित

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