Posted by: ramadwivedi | जुलाई 23, 2019

परहित सरस धर्म नहिं दूजा

परहित सरस धर्म नहिं दूजा , लेना यह संज्ञान |
पर-पीड़ा को समझ सका जो ,वो ही है भगवान् ||
सरवर जल नहिं पीता खुद ,तरुवर फल नहिं खाय
जगहित में ही सूरज जलकर , देता है यह ज्ञान |
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परहित सरस धर्म नहिं दूजा ,मानस में तुलसी ने गाया |
समझी जिसने पीर पराई , उसके मन में प्रेम समाया ||
प्रेम बिना नहीं सृष्टि चलती , वेद – पुराणों ने बतलाया |
जब -जब प्रेम घटा जगती में ,कृष्ण ने गीता ज्ञान सुनाया ||

** डॉ. रमा द्विवेदी **

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