Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | जुलाई 10, 2021

दो क्षणिकाएँ

1-
अब गम का मरहम 
उदासी,ख़ामोशी या
आँसू बहाना नहीं 
फेसबुक और सेलफोन
दुःख-दर्द-पीड़ा को
भुलाने तक का 
अचूक मरहम हो गया है|
 2-
न्यूकिल्यर परिवार में
मातम के समय में भी
कुछ ढाँढस,कुछ सहानुभूति
या आत्मीयता के कुछ शब्द 
अब हमारे पास बचे कहाँ हैं?
सिवाय इसके कि -
सेल फोन या फेसबुक में
अलग-अलग कोने में बैठ
नज़रें चुराने के सिवा | 

*डॉ. रमा द्विवेदी *
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