अर्थ  ले करके हमसे मिला कीजिये

पास कर  देंगे हम न गिला कीजिये |

शोध करवाना भी तो कठिन कार्य है
अर्थ को अर्थ  देना भी अनिवार्य है
आत्मसम्मान  को भी लुटा  दीजिये
पास कर  देंगे हम न गिला कीजिये |
मिठाइयों से भरा इक बड़ा थाल  हो
और खनकता हुआ उसमें कुछ माल हो
  राज की बात दिल में  छुपा लीजिये
पास कर  देंगे हम न गिला कीजिये |
आदि गुरुओं की भी तो  रही नीति यह
दक्षिणा के बिना कब हुई प्रीति  यह ?
द्रोण की  रीत  फिर से निभा दीजिये
पास कर देगें हम न गिला कीजिये |
बिन चढ़ावे के खुश देव होते हैं कब
आचमन के बिना  भोग लगते  हैं कब
दंडवत कर  नमन सर झुका कीजिये
पास कर  देंगे हम न गिला कीजिये |
*** डॉ रमा द्विवेदी ***

 

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Posted by: ramadwivedi | अगस्त 17, 2017

रक्षा बंधन -दो मुक्तक

रक्षाबंधन का त्योहार, बड़ा हर रश्ते में
भाई -बहिन का प्यार, बड़ा हर रिश्ते में
हर रिश्ते में व्यापार बहुत कुछ होता है
इनका अद्भुत संसार, बड़ा हर रिश्ते में |

***************
राखी पावन उपहार, बड़ा हर रिश्ते में
भाई का प्यार – दुलार, बड़ा हर रिश्ते में
बचपन में लड़ना और मनाना भी चलता
दिल का अनुपम विस्तार ,बड़ा हर रिश्ते में |

*** डॉ रमा द्विवेदी ***

 

 

 

 

अरे बनवारी लाल ! तुम इतने उदास -बदहवास से क्यों दिख रहे हो ? सब ठीक तो है न | तुम्हारा शोध कार्य कैसा चल रहा है ? सुना है तुम्हारे गाइड तो बहुत बड़े विद्वान हैं और बहुत ही कम समय में शोध-कार्य पूरा करवा देते हैं ?
बनवारी रुआंसा-सा होकर बोला – “ क्या बताऊँ मैडम ,कुछ कहते नहीं बनता, विद्वानों की बात न ही पूछो तो ही अच्छा है ”|
ऐसा क्या हुआ मुझे बताओ -“शायद मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकूँ ”?
मेरे गाइड इतने विद्वान थे कि खुद बोल-बोल कर शोध ग्रन्थ लिखवा देते थे पर ???
पर क्या ? ?
वे हर रोज मिठाई मंगवाते थे , इसके बिना वे एक शब्द भी नहीं बताते थे | यहाँ तक तो ठीक था, मैनें जैसे -तैसे झेल लिया और थीसिस सबमिट कर दी | मैंने सोचा चलो अब तो पी एच डी की डिग्री मिल ही जाएगी |
तभी उन्होंने मुझे बुलाकर कहा -“ बनवारी सुनो ,मैंने तुम्हारा शोध कार्य संपन्न करवा दिया है , तुम आज ही मुझे बाजार लेकर चलो और मुझे मेरी पसंद का उपहार दिला दो” |
मैंने उन्हें अपनी विवशता बताने की कोशिश की कि अभी मेरी जेब में उपहार खरीदने लायक पैसे नहीं हैं ,लेकिन वे नहीं माने और बोले अभी चलो” |
हम एक घड़ी की दुकान गए , उन्होंने एक महँगी घड़ी पसंद कर ली | मैंने अपनी जेब टटोली किन्तु घडीं की कीमत से पांच सौ रूपये मेरे पास कम थे | मैं बड़ी दुविधा में था कि क्या करूँ ? गुरु जी नहीं मानेगे और कही उल्टा सीधा बोल दिया तो मेरी बड़ी बेइज्जती होगी |
“तब फिर क्या किया तुमने” ?
तब मैंने दूकान के मालिक से बात की-“ ये मेरे गुरु जी हैं और इन्हें यही घड़ी चाहिए लेकिन मेरे पास पांच सौ रूपये कम हैं ,आप मेरी इससे महँगी घड़ी रख लीजिये और इन्हें यह घड़ी दे दीजिये | मैं एक दो दिन में पैसे देकर अपनी घड़ी ले जाऊँगा” |
दूकानदार को मेरी दयनीय स्थिति पर तरस आ गया और वह सहमत हो गया | “ मैंने घड़ी खरीदकर महा- गुरु प्रो सूर्यभान को दे दी | वे खुश हो गए और मैंने गंगा नहा ली कि चलो अब तो पीछा छूटा ,लेकिन ” ???
लेकिन क्या ?“अब क्या हुआ ? पी एच डी की डिग्री तो मिल गई न ”?
उसने उच्छ्वास लेते हुए कहा -“ थीसिस रिजेक्ट हो गई ,परीक्षकों ने रिपोर्ट में लिखा कि इसमें किसी भी कोटेशन के रेफरेंस बुक का नाम नहीं दिया गया है, यह शोध स्तरीय नहीं है इसलिए पी एच डी की डिग्री नहीं दी जा सकती ”| इसके कारण मेरा प्रमोशन भी रुक गया |
मैडम, मैं ज़िन्दगी से निराश हो गया हूँ , मेरी स्थिति अब ऐसी हो गई है कि “दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम ”|
मैं भी सोच में पड़ गई कि क्या गुरुओं का स्तर इतना गिर गया है ??

-डॉ रमा द्विवेदी

 

 

 

“सुचित्रा आजकल हमेशा ऑनलाइन रहती हो ,क्या करती रहती हो ”?
“हाँ साधना ! मैं कविता लिखना सीख रही हूँ | कविता की इतनी  सारी  विधाएँ  हैं  और  उससे भी अधिक गुरु हैं  | सबसे सीखने में समय लगता है | कोई ऐसा बताता है ,कोई कैसा बताता है | कोई इनबॉक्स में दौड़ा चला आता है और  कहता है मैं आपको लिखना सिखाऊंगा और मैं फिर उस ओर आकर्षित हो जाती हूँ | आखिर मुझे भी तो गुरु ही बनना है वह भी रातों रात ताकि मेरे भी चेले बने और मैं प्रसिद्द हो जाऊं” |
“क्या ! तुम भी गुरु बनना चाहती हो ? भला इतना लोभ क्यों ”?
 “अरे साधना ! तुम्हें पता नहीं , आजकल का यही ट्रेंड  है | गुरु बनो और चेले बनाओ ,मुफ्त में नाम कमाओ | आभासी दुनिया में गुरु -चेला का खेल मुफ्त है ,इसलिए इस खेल में सभी शामिल होना चाहते हैं | नो गुरु दक्षिणा ”|
सुचित्रा सच बताओ -“क्या वे चेले सच में गुरु का सम्मान करते हैं ”?
सुचित्रा  “नहीं करते क्योंकि  वे भी गुरु बन जाते हैं ”|
साधना -धन्य हो `लोभी गुरु ,लालची चेला ,पड़ें नरक में ठेली  ठेला ”|
*** डॉ रमा द्विवेदी ***
Posted by: ramadwivedi | अगस्त 5, 2017

क्या बताऊँ यार ? लघु कथा 

 

भोलानाथ शर्मा जी को अमेरिका में रहते तीस वर्ष हो गए थे | उनके एक लड़की और एक  लड़का था | दोनों ही विवाह योग्य हो गए थे | शर्मा जी ने अपने नाते रिश्तेदारों ,परिचितों एवं मित्रो से वर -वधू  बताने को कह रखा था और शादी डॉट कॉम में भी दोनों की प्रोफ़ाइल डाल रखी थी | कई लड़के -लड़कियों के प्रस्ताव और फोटो आते पर बात न बनती |
 एक दिन गार्डन में टहलते हुए योगेंद्र वर्मा जी की मुलाकात  शर्मा जी  से हो गई | दोनों गहरे मित्र रह चुके थे  लेकिन वर्षों बाद भेंट हो रही थी | वर्मा जी ने बड़ी ही आत्मीयता  से हाथ मिलाकर कहा `कैसे हो यार’?  मुद्दतों बाद मिल रहे हो |  सब ठीक तो है ? अब तो आपके बच्चे शादी करके सेटल हो गए होंगे परन्तु यह क्या शर्मा जी ने   उदास लहजे  में कहा – `कहाँ यार ! बच्चों को कोई पसंद ही नहीं आता’  |
“मैंने कहा कि पसंद क्यों नहीं आता” |
 “ अब क्या बताऊँ यार ,जो हमें पसंद नहीं आता वो उन्हें पसंद आता है ”|
“मैंने कहा -जो उन्हें पसंद है , तुम वो कर दो ”|
शर्मा जी ने  कहा -“एक दिन मेरा लड़का एक फोटो को हाथ में लेकर देख कर गंभीर होकर बोला ,मुझे यह पसंद है ,मैं इससे शादी करूँगा | यह सुनकर मेरी बाँछें खिल गईं कि  चलो इसे कोई तो पसंद आया | लपक कर मैंने फोटो उससे लेकर देखा तो वो लड़की की नहीं लड़का की फोटो थी | मैं अपना माथा पकड़कर बैठ गया” |
उनकी बात सुनकर मैं भी हतप्रभ ताकता रह गया |
डॉ रमा द्विवेदी

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