तुम मेरे साथ रहो

 तुम मेरे साथ रहो घर में उजाला बनकर,
 यूं मुझे दर्द न दो दर्द की हाला बनकर ।

यूं ही चाहेगे तुम्हें कयामत के आने तक,
यूं मुझे छोड न दो भंवर में धारा बनकर।

जिधर भी देखती हूं तू ही तू नज़र आये,
मैं सबको देखती हूं तेरा नाज़ारा बनकर।

तेरे ही इश्क में क्या-क्या नहीं मैं सहती हूं,
मैं हर घडी से गुजरती हूं अंगारा बनकर।

मेरी सांसों की नैया डूबती भंवर में सनम,
कि अब तो आके बचा ले तू किनारा बनकर ।

तेरे लिए तो हमने इस जहां को छोड दिया,
कि अब तो दर्श दिखा कोई सितारा बनकर।

डा. रमा द्विवेदी

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खुद ही तकदीर बनानी होगी

            अपनों ने उसे लूटा है,
             परायों ने उसे लूटा है।
             किसको कहे वो अपना,
             जब सबने ही उसे लूटा है॥

               खुद ही तुम्हें अपनी,
             तस्वीर बनानी होगी।
               खुद ही तुम्हें अपनी,
             तकदीर बनानी होगी॥

               न रहना इस भ्रम में,
             कोई साथ देगा तुम्हें।
               साथ तो देगा नहीं,
             हरदम मात देगा तुम्हें॥

              तुमने सदा ही फूल ,
             बिछाए हैं उसकी राह में।
              उसने सदा ही शूल,
             बिछाए हैं तेरी राह में॥

              फूल सोचता है कि,
             शूल रक्षा करेगा उसकी।
             “माली” तोड ले जाता उसे,
             शूल कर न पाता रक्षा उसकी॥

              फूल मसल दिए जाते हैं ,
             पर शूल से सब डरते हैं।
               प्रतिरक्षक शक्ति है जिसमे,
             स्वयं वे अपनी रक्षा करते हैं॥

               कोमल सौन्दर्य सदा कुचला जाता,
             यह फूल हमें बतलाते हैं।
               चुभ जाओ शूलों की तरह,
             अगर कोई तुम्हें सताते हैं॥

                आत्मरक्षा सबसे जरूरी है,
              यह शूलों से सीखना होगा।
               न सहो किसी के जुल्मों को,
              हमको बचाव करना होगा॥

               निर्बल जीवन क्या जीवन है,
              इससे तो मरना अच्छा है।
              अपमानित होकर क्यों जीना?
              कुछ करके मरना अच्छा है॥

                डा. रमा द्विवेदी

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अपना नहीं कोई है

       सूना है मन का अंगना ,अपना नहीं कोई है,
       हर सांस डगमगाती सी  बेसुध हुई हुई है।

       गिरती है पर्वतों से ,सरपट वो दौडती है,
       प्रिय से मिलन को देखो पागल हुई हुई है।

       बदरी की बिजुरिया सी, अम्बर की दुलहनियां सी,
       बरसी है जब उमड  कर सतरंग हुई हुई है।

       चन्दा की चांदनी सी,तारों की झिलमिली सी,
       उतरी है जब जमीं पर शबनम हुई हुई है।

       बाहों में प्रिय के आके हर दर्द भूल जाती,
       दिल में समायी ऐसे सरगम हुई हुई है।

       इक बूंद के लिए ही बनती है वो दीवानी,
       इक बूंद जब मिली तो मुक्ता हुई हुई है।

        डा. रमा द्विवेदी  

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रची बसी भारत की मिट्टी

             कोई कहता है हिन्दी बेढंगी,
             कोइ कहता है बैरंग चिठ्ठी।
             हिन्दी तो है हिन्द की भाषा,
             रची-बसी भारत की मिट्टी॥

             गैरों को गले लगाना,
             प्रीति हमारी है यह कैसी?
             अपनों को अपमानित करना,
             रीति हमारी है यह कैसी?

             अपनी हिन्दी अपनाने को,
             यह रीति बदलनी ही होगी।
             अंग्रेजी के प्रति मोह है जो,
             यह सोच बदलनी ही होगी॥

             तब ही हम हिन्दी से,
             हिन्दुस्तान बनायेंगे।
             पूर्ण स्वतन्त्र होंगे तब ही,
             जब सब हिन्दी को अपनायेंगे॥

             डा. रमा द्विवेदी

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मां के आंचल को तरसती रही (गीत)

मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं,
फूल से पंखुरी जैसे झरती रही ।

जन्म लेते ही मां ने दुलारा बहुत,
अपनी ममता निछावर करती रही…
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

वक्त के हाथों मैं बडी हो गई,
मां की चिन्ता की घडियां बढती रही…..
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

ब्याह-कर मैं पति के घर आ गई,
मां की ममता सिसकियां भरती रही…
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

छोड कर मां को दिल के दो टुकडे हुए,
फिर भी जीवन का दस्तूर करती रही..
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

वक्त जाता रहा,मैं तडपती रही,
मां के आंचल को मैं तो तरसती रही…
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

एक दिन मैं भी बेटी की मां बन गई,
अपनी ममता मैं उसपर लुटाती रही…
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

देखते-देखते वो बडी हो गई,
ब्याह-कर दूर देश में बसती रही….
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

टूटकर फिर से दिल के हैं टुकडे हुए,
मेरी ममता भी पल-पल तरसती रही..
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

वक्त ढलता रहा, सपने मिटते रहे,
इक दिन मां न रही,मैं सिसकती रही…..
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

सब कुछ मिला पर मां न मिली,
मां की छबि ले मैं दिल में सिहरती रही…
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

फूल मुरझा के इक दिन ज़मीं पे गिरा,
मेरी सांसों की घडियां दफ़न हो रहीं….
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रही।

जीवन का नियम यूं ही चलता रहे,
ममता खोती रही और मिलती रही…
मेरी सांसों की घडियां बिखरती रहीं।

डा. रमा द्विवेदी

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कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है

             कि नारी सदा ही सताई गई है,
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              कभी अपनों के खातिर बलिदान देती,
              कभी उसकी बलि चढाई गई है….
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              कभी प्यार से सबने लूटा है उसको,
              कभी मारकर वो जलाई गई है…
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              कभी खुद ही जौहर दिखाती रही है,
              कभी उससे जौहर कराई गई है…..
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              कभी जन्मदाता ने बेंचा है उसको,
              कभी सन्यासिनी वो बनाई गई है..
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              समूहों में मिल कर नोंचा-घसीटा,
              फिर सडकों में निर्वस्त्र घुमाई गई है…
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              कि ले करके पैसे बने तुम हमारे,
              फिर दासी वो कैसे बनाई गई है…
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              ये किस्से-कहानी की बातें नही हैं,
              कि कोठे पे ज़बरन बिठाई गई है…
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              ज़रा सोच लो जुल्म करने से पहले,
              तुम्हारी ही संगिनी क्यों बनाई गई है..
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              बने जिसलिए हम,न अधिकार पाया,
              फिर क्यों-कर यह रचना रचाई गई है..
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              कभी जी के देखो हमारी जगह पर,
              कि कितना वो सूली पे चढाई गई है?
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              कि कैसे चलेगा यह संसार सारा?
              गर तुम्हीं से यह दुनिया चलाई गई है..
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

              कि कैसे जिएं दर्द सह करके इतना?
              हुआ न  खुदा,न खुदाई हुई है…
              कभी खुद मिटी है,मिटाई गई है।

               डा. रमा द्विवेदी
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हर सांस बन्दी है यहां

  कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहां?
  कैसे रचे इतिहास जब आकाश बन्दी है यहां?

  अंकुर अभी पनपा ही था कि नष्ट तुमने कर दिया,
  कैसे लेंगे जन्म जब गर्भांश बन्दी है यहां?
  कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहां?

  सपने भी जब देखे हमने उनपे भी पहरे लगे,
  कैसे पूरे होंगे जब हर ख्वाब बन्दी है यहां?
  कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहां?

  सदियों से रितु बदली नहीं,अपनी तो इक बरसात है,
  कैसे करें त्योहार जब मधुमास बन्दी है यहां?
  कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहां?

  त्याग की कीमत न समझी त्याग जो हमने किए,
  छीन लीन्हीं धडकनें पर,लाश बन्दी है यहां।
  कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहां?

  कुछ कहने को जब खोले लब,खामोश उनको कर दिया,
  कैसे करें अभिव्यक्त जब हर भाव बन्दी है यहां?
  कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहां?

  खून की वेदी रचा कर तन को भी दफ़ना दिया,
  कैसे जिएं? कैसे मरें? अहसास बन्दी है यहां।
  कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहां?

   डा. रमा द्विवेदी

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