Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | फ़रवरी 26, 2021

प्राण अर्पण कर गया है- गीत   

लाल जो माँ भारती पर प्राण अर्पण कर गया है |

 मिट्टी में मिल फिर उगूँगा आस- सर्जन कर गया है ||


था कठिन कितना कि तुम , सीमाओं पे देते थे पहरा 

माँ का आँचल छोड़कर , सिन्दूर का रंग लाल गहरा

 बहन की रक्षा का वादा , मान पूरण कर गया है |

 लाल जो माँ भारती पर ,प्राण अर्पण कर गया है | |


पिता का था वह सहारा , माँ के नयनों का था तारा 

धूर्त दुश्मन चाल से ,पलभर में था विश्वास हारा |

 माँ भारती के वास्ते , जां समर्पण कर गया है | 

लाल जो माँ भारती पर,प्राण अर्पण कर गया है ||


कौन से वे पुण्य थे जो ,कोख में मेरी तुम आए

 जन्म -जन्मों की तपस्या ,लाल जो तुम जैसा पाए |

 मातृभूमि के लिए , मधुमास तर्पण कर गया है | 

लाल जो माँ भारती पर,प्राण अर्पण कर गया है ||
-डॉ. रमा द्विवेदी

Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | फ़रवरी 26, 2021

प्रेम पर कुछ हाइकु 

1 –

प्रेम प्रभाव

 तरंगित हो उठें 

  मन के भाव  | 

2 –

प्रेम दिवस 

याद फिर आ जाते

बिसरे पल |

3 –
प्रेम गुलाब

नृत्य करती देह

देती आभास |

4 –
लाल गुलाब

प्रेम का अहसास

बेहद खास |

5 –
अवर्णनीय

प्रेम का मधुमास

अतुलनीय |

 *डॉ. रमा द्विवेदी *

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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | फ़रवरी 26, 2021

बासंती दोहे





1-
दसों दिशाएं हँस रहीं,सुरभित देख बसन्त।
कलियाँ घूँघट खोलकर,देख रहीं प्रिय कन्त।।
2-
वन-उपवन पुलकित हुए,करके नव श्रृंगार।
नदियाँ कल-कल कर उठीं,नव यौवन संचार।।
3-
बदली सूरज ने दिशा ,ऊष्मित हुआ प्रकाश।
नर-नारी पुलकित हुए, पाकर नव अहसास ।।
4-
कुसुमाकर ने प्रेम से,खूब चलाए बाण |
रति-कन्याएँ हैं विकल,कौन बचाए प्राण||
5-
बसंत उत्सव देख कर, डूब गया संसार |
जड़ -चेतन मधुमय हुए,प्रेम जीव आधार ||
**डॉ.रमा द्विवेदी**
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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | फ़रवरी 21, 2021

विविध दोहे

1 –

लेके निज संकल्प जो ,करते उचित प्रयास |

किस्मत भी तब साथ दे ,प्रभु पर हो विश्वास ||

2 –

कोशिश से ही जीतते , जीवन के संग्राम |

संघर्षों से जूझ कर , बने राम औ श्याम ||

3 –

कोशिश बिन कब हो सके ,जीवन में उत्थान |

किया चित्त एकाग्र जब , बन गए बुद्ध महान ||
4 –

शिल्पकार की कोशिशें , हुनर और विश्वास |

ताजमहल दूजा नहीं , रचा एक इतिहास ||
5 –

मिट्टी से बर्तन गढे , इल्म बहुत अनमोल |

पर हरदम कोशिश करे , मिले न चाहे मोल ||


6 –

जीवित जग में हर कला , कोशिश ही आधार |

जीवन चलता हुनर से ,और चले संसार ||

** डॉ. रमा द्विवेदी **

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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | फ़रवरी 21, 2021

खेल -दोहे

1 –

खेल -खेल में आजकल , दे देते आघात | 

बड़े -बड़े कानून को , दे देते हैं  मात || 

2 –

बेरहमी से पीटता  ,नहीं शर्म औ लाज | 

खेल -खेल में बोलता , क्राइम का सरताज ||

 3 –

खेल -खेल में कर रहे , हत्या जैसे काम  |

 चोर -सिपाही एक जब,निकले क्या परिणाम ||

  4 –

सत्य रहा  संघर्षरत , झूठ सदा  बेलाज  |

  लबरों  के इस खेल में , सिसक रहा सच आज || 

5 –

ड्रग का सेवन अति विकट ,रहा पीढ़ियाँ लील |

 खेल- खेल में लिप्त हो , युवा बना  अश्लील || 


**डॉ. रमा द्विवेदी **

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