Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | सितम्बर 27, 2020

तंग  दिल अमीर भाई -लघु कथा 

    पंडित रामू  काका के तीन  संतानें थीं । एक पुत्र  दो पुत्रियां । छोटे काश्तकार थे और स्वतंत्रता आंदोलन में जेल जा चुके थे । पुत्र सिद्धार्थ माँ का बड़ा आज्ञाकारी और पढ़ने में बहुत मेधावी हर परीक्षा में अव्वल आता था । काका बहुत  खुश थे कि उनका बेटा बहुत नाम कमाएगा लेकिन शादी होते ही वो बदल गया और अपनी बीबी बच्चों को लेकर शहर में  बस गया ।  कभी  भी उसने  परिवार की आर्थिक  मदद नहीं की बल्कि जब घर  आता जरुरत की हर चीज  ले जाता । पुत्री श्यामा का विवाह काका ने कैसे तो क़र्ज़  लेकर शहर  में खाता पीता घर देख  कर बिचवानुं पर विश्वास करके   कर दिया । गाँव के सीधे सादे काका  यह समझ ही नहीं पाए कि दामाद शराबी -जुआरी है ,वह श्यामा को मारता पीटता । श्यामा  आती जाती रही कई वर्ष ऐसे ही बीत गए और वह चार बच्चों की  माँ बन गई । जब पुत्री की तकलीफे हद से ज्यादा बढ़ गईं तब  काका पुत्री श्यामा को  हमेशा के लिए घर ले आये । चार बच्चों के साथ पुत्री का  लालन -पालन करना आसान नहीं था फिर भी उन्होंने किया । छोटी पुत्री वामा  पढ़ने में बहुत  तेज थी लेकिन साधन के अभाव में  काका चाहते हुए भी उसे दसवीं तक पढ़ाकर उसकी  शादी कर दी और बाकी की  पढ़ाई उसने प्राइवेट परीक्षा देकर पूरी  की ।  वह अपनी लगन - मेहनत से स्वावलम्बी बन अपने पति के साथ बहुत  खुश थी । काका ने बहुत कोशिश की श्यामा के बच्चे  जय और विजय पढ़ लिख जाएँ और लायक बन कर अपनी माँ की देखभाल कर सकें लेकिन दुर्भाग्य ने  पीछा नहीं छोड़ा और बच्चे मुश्किल से दसवीं पास कर पाए । काका की चिंता बढ़   रही थी कि उनके बाद श्यामा का क्या होगा । छोटी पुत्री लगातार  दबाव डाल रही थी कि उसके नाम कुछ जमीन कर दे ताकि  उसके रहने खाने का प्रबंध हो  जाए लेकिन बेटा - बहू इस बात से नाराज़ हो गए और घर में कलह युद्ध छिड़ गया  और सिद्धार्थ जब जब आता श्यामा  को अपमानजनक शब्द बोलता  `` इसे अनाथाश्रम भेज दो ,घर से निकाल दो ,कही जाकर मर  क्यूँ नहीं जाती ,हमने ठेका नहीं ले रखा  है ,हमारी छाती पर मूंग दल रही है ,''जैसे वाक्यों को बोल बोल कर अपमानित करता ।
  काका -काकी और  पुत्री वामा  को असहनीय दुःख  होता । वामा ने बड़े भाई को समझाने की बहुत कोशिश की यह कहकर कि हम दोनों समर्थ हैं दोनों मिलकर मदद करेंगे तो श्यामा का जीवन निर्वाह हो जाएगा  लेकिन परिणाम ``ढाक के तीन पात '' ही निकला | सिद्धार्थ इस बात से नाराज होकर  कुछ वर्षों तक वामा से बात  करना भी  बंद कर दिया कि यह  पिता से क्यों कहती है कि`` श्यामा   के जीवन के भरण पोषण के  लिए कुछ जमीन  उसके नाम कर दें ''। काकी  कैंसर से चल बसी लेकिन जाने  से पहले उन्होंने काका से वचन  लिया कि ``श्यामा  के नाम कुछ जमीन कर दे''|    काका  ने  दस बीघा जमीन श्यामा के नाम  कर दी बाकी जमीन  बहू के नाम कर दी ।घर में जैसे   भूचाल आ गया । सिद्धार्थ विश्व विद्यालय में प्रोफ़ेसर था ,अच्छा रहन सहन ,तिमंजिला घर और  स्टेटस था लेकिन बहुत संकीर्ण सोच वाला और बेहद स्वार्थी  था।  उसे मैं और मेरे बच्चे इसके सिवा कुछ भाता  नहीं था ।  छोटी बहिन की  सुख -समृद्धि उसे   फूटी आँख भी नहीं भाती  थी फिर भी समाज में अच्छा बनने के लिए दिखावे के लिए कभी कभी वामा से बात करता था ।
 काका ने श्यामा की दोनों बेटियों की शादी कर दी । कुछ वर्षों के बाद काका भी चल बसे । सिद्धार्थ का व्यवहार श्यामा  के प्रति बद से बदतर होता गया फिर भी श्यामा  सहती रही । कहाँ जाती कही  ठौर ठिकाना नहीं था । पिता के कच्चे टूटे फूटे मकान में रहकर जीवन गुजारने लगी । बच्चे भी माँ का सहारा न  बन सके ,माँ को अकेला खंडहर  घर में छोड़कर अपने परिवार के साथ  बाहर बस गए । बच्चे जब पैसे चाहिए होते तब माँ के पास आते । भाई सिद्धार्थ कई वर्षों बाद एक बार अपनी पत्नी ,बेटे  और पोते के साथ आया । बहिन ने  भाई की खूब  आवभगत की  लेकिन भाई ने  एक बार भी उसका दुःख- सुख नहीं   पूछा । बात कुछ गरीबी की चली तो सिद्धार्थ ने श्यामा को लक्ष्य कर  कहा `` गरीब का कोई मान-अपमान  नहीं होता और उन्हें कभी भी शादी ब्याह में  नहीं बुलाना चाहिए ,,अपने स्तर वालों को ही  बुलाना चाहिए और अगर बिन बुलाए आ जाएँ तो सौ जूते मार कर बाहर निकाल देना चाहिए ।''
 सबसे बड़े शिक्षा के पद से  निवृत्त तंग दिल अमीर बड़े भाई के  ऐसे अपमानित शब्द सुनकर गरीब बहिन श्यामा फूट -फूट कर रो पड़ी । 
-डॉ. रमा द्विवेदी 
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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | सितम्बर 27, 2020

जाहिल सेक्रेटरी -लघु कथा 

डॉ मीता महिलाओं के प्राइवेट डिगरी कॉलेज में हिन्दी पढ़ाती थी | गुजराती मैनेजमेंट था जो हर दो साल में बदल जाता था और कॉलेज के नियम भी | परिणाम यह हुआ कि परीक्षा परिणाम का स्तर तेजी से गिरने लगा  क्योंकि अच्छा  पढ़ाने वाले  लेक्चरर को इतना सताते  और कम पैसे देते कि या तो वो खुद छोड़ कर चली जाती या पार्ट टाइम काम करती | मैनेजमेंट वर्षों से काम कर रहे लेक्चरर  को हटा कर सबको पार्ट टाइम ही करना चाहते थे ताकि कम पैसे में काम चले लेकिन कम पैसे में सिर्फ नए लोग ही आते, जिनको न पढ़ाने का अनुभव होता और न छात्राओं को अनुशाशन में रखने की काबलियत  | परिणाम स्वरूप  छात्राएं स्वतंत्र हो गईं  और परीक्षा परिणाम का स्तर धड़ाधड़ नीचे आ गया और एडमीशन आना भी  बहुत कम होते गए | डॉ मीता और दो तीन लेक्चरर ही बचे  थे जो 16 वर्षों से काम  कर रहे थे | मीता तो फुलटाइम काम छोड़कर पार्ट टाइम काम करने लगी थी | नया मैनेजमेंट में एक  अनपढ़ जाहिल सेक्रेटरी  आया जो सीनियर लेक्चरर को  निकालने के लिए कई षणयंत्र रच रहा था |  विशेषकर डॉ मीता के खिलाफ वह कारण ढूढं  रहा था क्योंकि वही एक ऐसी लेक्चरर थी की किसी से नहीं डरती थी ,उसके विषय में हरदम सौ प्रतिशत परिणाम आता और वह हमेशा अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती | कोई भी समस्या हो वह ही मैनेजमेंट के पास जाती | लेक्चरर को कहता ``कम से कम बीस एडमीशन हर किसी को लाना है , परीक्षा में ड्यूटी करने का यूनिवर्सिटी से जो लेक्चरर का पारिश्रमिक  आता  वो  हड़प लेता |  हर रोज चलती कक्षा में  घुस आता और छात्राओं के सामने लेक्चरर को बोलता आपको खड़े  रहकर ही पढ़ाना है'' | उसके इस व्यवहार से सभी लेक्चरर परेशान थे | 
 एक दिन डॉ मीता की क्लास में जाहिल सेक्रेटरी रमेश शाह आ गया और बोला - `` मैडम  पढ़ाई क्यों नहीं हो रही''  | ``मीता ने मीठे   शब्दों में सहजता से उत्तर दिया ,पढ़ाई ही तो रही है  प्रश्न पूछने का समय दिया है ताकि जो समझ न आया हो पूछ सकें ''|
 `` सेक्रेटरी शाह उस समय तो कुछ नहीं बोलकर चुपचाप चला गया लेकिन उसके माथे पर बल पड गए  ''|
 एक दिन रमेश शाह ने डॉ मीता  को ऑफिस में बुलाया और बोला -`` आप कॉलेज की प्रिंसपल बन जाइए ''| 
मीता ने तुरंत जवाब दिया -`` मैं प्रिंसपल कैसे बन सकती हूँ  क्योंकि मैं  तो पार्टटाइम काम करती हूँ ''|
 वह बदला लेने के लिए मौके की तलाश करने लगा `` छमाही परीक्षा के समय सेक्रेटरी शाह बोले -जिस विषय की परीक्षा छात्राएं लिखेंगी उस विषय की लेक्चरर भी उसी समय छात्रों के साथ बैठ कर  परीक्षा लिखेगी ''   |
 स्टॉफ में हड़कंप मच गई ,कोई उसके सामने जवाब नहीं दे पा रहा था सिर्फ सबसे बड़ी, निडर और अनुभवी मीता  ही थी जो सबकी लड़ाई  लड़ती थी |
 सबसे पहले सेक्रेटरी ने डॉ  मीता  से प्रश्न किया `` क्या आप मेरी बात से सहमत हैं ''  |
 मीता  ने जवाब दिया - `` यह नहीं हो सकता सर मैं  परीक्षा नहीं लिखूँगी , यह नियम के विरुद्ध है '' |
 ``बारी -बारी से उसने सबसे यही प्रश्न  पूछा और सब लेक्चरर ने भी एक ही  जवाब दिया'' | 
   ``सेक्रेटरी शाह जो सिर्फ सातवीं तक ही पढ़ा था अपने मन के  विपरीत उत्तर सुन कर बौखला गया और ऑफिस के मैनेजर को बोला सबकी सर्विस फ़ाइल निकालो |''कॉलेज के प्रेसिडेंट ने उसे बहुत समझाया कि ``सीनियर लेक्चरर के साथ ऐसा व्यवहार मत करो लेकिन उसने एक न सुनी ''|
 ``तब डॉ मीता ने निर्भीकता से  कह दिया वह कल से कॉलेज नहीं आएगी ''|     डॉ  मीता ने अगले दिन इस्तीफा जाहिल सेक्रेटरी के हाथ में थमा  दिया यह लिखकर कि`` मैं  मैनेजमेंट के दुर्व्यवहार के कारण नौकरी छोड़ रही हूं ''|
  इस्तीफा मंजूर हो गया और कुछ ही समय के अंतराल में सभी सीनियर  लेक्चरर ने भी इस्तीफा दे दिया और कॉलेज सदा के लिए बंद हो गया | 
**डॉ.रमा द्विवेदी **
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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | सितम्बर 27, 2020

बेशर्मी -लघु कथा 

कल ही हमारे एक अमीर  मित्र के बेटे के विवाह का रिसेप्शन था । चूँकि पति -पत्नी दोनों ही बड़े ओहदे पर थे अतः स्वाभाविक है बड़े ओहदे वालो ने ही इस पार्टी में शिरकत की । मैं भी उस आयोजन में मौजूद थी तब मैंने देखा कि  हमारे एक अति परिचित ने अपने ड्राइवर को खाना खाने को कहा । यह देखकर मैं यह सोचने लगी कि क्या हर मेहमान को अपने ड्राइवर को ऐसे आयोजन में खाना खाने के लिए कहना चाहिए ? मेरे सिद्धान्त के अनुसार तो `नहीं '। क्योकि आज के मंहगाई के युग में जहां कार्ड में मिस्टर और मिसेज लिखा जाता हो ,जहां बच्चो तक के लिए नहीं लिखा जाता तब नौकर या ड्राइवर को खाने की अनुमति कैसे दी जा सकती है ?  दूसरी बात यह कि अगर पार्टी में मेहमानों की पाँच सौ गाड़ियाँ आई हो और हर कोई अपने ड्राइवर को बिना सोचे समझे बेशर्मी से खाने की अनुमति दे दे तो क्या यह मेजबान पर भारी नहीं पड़ सकता ? मेजबान की भद्द उड़ने के साथ -साथ कई परेशानियां  भी आ  सकती हैं । बात मानसिकता और सोचने की है । मालिक अपने ड्राइवर को एक वक़्त  खाने के लिए पैसे दे सकता है और देना भी चाहिए क्योंकि  इतना धनवान तो  वह होता ही है । अपनी सुविधा का भार खुद वहन करें दूसरो पर न डालें ।
 **डॉ.रमा द्विवेदी**
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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | सितम्बर 27, 2020

बाहुबली ठाकुर का स्वागत -लघु कथा 

वर्षों बाद शहर से गाँव आई संजना ने अपनी बहिन कस्तूरी से पूछा -`ये गाँव के सारे लोग कहाँ भागते हुए जा रहे हैं ''? 
कस्तूरी ने बताया -`` आज दस वर्ष की सजा काट कर `दिगपाल सिंह ' गाँव आ रहा है और उसे लाने  के लिए गाँव से  पांच जीपें और बंदूकें लेकर लोग  उसको  फूल माला पहना कर और हवाई फायरिंग करते हुए ला रहे हैं  ''। 
 संजना ने पूछा -`` इसे जेल क्यों हुई थी'' ? कस्तूरी ने बताया - ``इसने डकैती डाली  थी और मुकेश साहू का मर्डर कर दिया था ,उसी में इसे दस साल की  सजा हुई थी । गाँव के लोग इसके सामने थर -थर कांपते हैं इसलिए रास्ते  में लोग इसके स्वागत में हाथ जोड़कर खड़े हैं ''। 
संजना को बहुत आश्चर्य हुआ कि ``एक सजायाफ़्ता बाहुबली ठाकुर का भयवश इतना स्वागत ?जमींदारी तो कब की ख़त्म हो गई लेकिन  गाँव के लोग  आज भी बाहुबलियों से भयभीत रहते  हैं । इन्हें गुलाम मानसिकता से आज़ादी कब और कैसे मिलेगी '' ?
 
**डॉ.रमा द्विवेदी** 
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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | सितम्बर 27, 2020

कोरोना का क़हर -लघुकथा

फोन की घंटी बजी –

हेलो मम्मी ! उधर से अचला बोली |

हाँ बेटा क्या हुआ ?

मम्मी ! “यह कोरोना और कितना क़हर ढायेगा ? इशिता की देखभाल करनेवाला कोई नहीं ? घर के और ऑफिस के काम कर -कर के मैं बहुत संत्रस्त हूँ | मैं क्या करूँ ? इशिता बहुत परेशान करती है | उसकी देखभाल के लिए ही एक आदमी चाहिए | आप भी नहीं आ सकते | मैं कोरोना से बच भी जाऊं लेकिन मानसिक तनाव से मैं अवसाद ग्रस्त हो जाउंगी ”|

मम्मी ने कहा -“ तुम सही कह रही हो पर इशिता अभी दो वर्ष की ही है ,उसे कोई समझ तो है नहीं | सारी जिम्मेदारी तुम दोनों पर आ गई है | बहुत कठिन समय है पर बेटा थोड़ा धैर्य से काम लो ,सब ठीक हो जाएगा ”|

अचला उदास होकर बोली -“ कब तक धैर्य रखूँ मम्मी ”?

**डॉ. रमा द्विवेदी **

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