1 -मेरा देश है प्यारा मुझको ,यह मेरी पहचान है
 इससे ही  है वजूद  मेरा,आन,बान और शान  है
 सीमा में प्रहरी बन तत्पर रक्षा में तैनात खड़े जो
 बारम्बार नमन करते  , उनसे ही देश महान  है ।
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2 -आज़ादी का मर्म न समझा ,बदल गया इंसान है
केवल आपहि  आप चरे , वो मानुष पशु समान है
भूल गए  आचार संहिता , मैं ,मैं ,मैं का जाप करें
सारे नियम ताक में रख, खुद बन बैठा भगवान है ।
डॉ रमा द्विवेदी

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Posted by: ramadwivedi | अगस्त 4, 2016

धंधा -लघुकथा

डॉ विद्दोतमा को घनिष्ठ परिचित और प्रतिष्ठित लेखिका `मधुरिमा’  का  फोन आया ।
विद्दोतमा तुमसे एक बात कहनी है-“ समझ नहीं आ रहा कि कहूँ  या न कहूँ” ।
विद्दोतमा ने कहा -“ऐसी क्या बात है जो आपको कहने में इतना संकोच हो रहा है ”।
 मधुरिमा  ने कहा – तुम बहुत सिद्धांतवादी हो न ? तुम्हें कभी ऐसे काम करते नहीं सुना।
विद्दोतमा ने औपचारिकता वश ही कहा -“कहिये तो सही”
 मधुरिमा  ने कहा -“ एक पी एच डी  की थीसिस लिखनी है , तुम जो मेहनताना मांगोगी मिलेगा ”।
विद्दोतमा को इस  अप्रत्याशित प्रस्ताव की कल्पना नहीं थी ,“ उसने संयत स्वर में इतना ही कहा मैं यह `धंधा’ नहीं करती ”।
डॉ रमा द्विवेदी
Posted by: ramadwivedi | अगस्त 4, 2016

घन -घन गरजत-घनाक्षरी

 

घन -घन गरजत, कारे मेघ बरसत,  जियरा में बहुतहि ,अगन लगावै  है
दम -दम दमकत, चंचल बिजुरिया जो, तडपत मनुआं को, बहुत डरावै  है
घटा घनघोर चढ़ी, बहुतहि शोर करी, प्रियतम तोरि  सुधि, बार-बार आवै  है
कारी-कारी रतियों में, बरसत अँखियाँ से , मदनहुँ मोरि तन, बहुत जरावै है।

 डॉ रमा द्विवेदी

Posted by: ramadwivedi | जुलाई 26, 2016

कैसा दौर आया है-ताजा मुक्तक

Presentation1 KAISA DAUR

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