Posted by: ramadwivedi | अगस्त 31, 2018

विकर्षण -लघुकथा

“तुम शादी कर लो विज ” माँ ने बेटे से कहा |
विज ने कहा -“मुझे शादी नहीं करना ”|
माँ ने कहा -“क्यों नहीं करनी  शादी ? अब तो  तुम सफल अभिनेता हो ,शादी करके घर -परिवार बसा लो ”|
विज ने कहा -“ घर -परिवार बसाने के लिए शादी करना जरुरी तो नहीं है माँ ”|
माँ ने कहा -“ शादी कर लोगे तो घर में बच्चे होंगे और घर में बच्चों से खुशियां आएंगी ”|
विज ने कहा -“ माँ आपको बच्चा ही चाहिए तो मैं आपको बच्चा लाकर दूँगा ,बस शादी  करने की बात कभी न करना ”|
माँ ने कहा -“ मुझे तुम्हारा बच्चा चाहिए ,किसी और का नहीं ”|
विज  ने कहा -“ वह मेरा ही बच्चा होगा ”|
माँ ने पूछा -“ कैसे होगा तुम्हारा बच्चा ”?
 विज ने कहा – थोड़ी प्रतीक्षा करो  और विज  लन्दन  में जाकर सरोगेसी से बच्चा पैदा कर के  माँ को लाकर दे दिया ” |
माँ ने फिर पूछा -“ सच बताना विज तुम्हें शादी करने में रूचि  क्यों नहीं है ”?
विज ने कहा – “  मैं स्त्रियों के संग कोई आकर्षण महसूस नहीं करता बल्कि `विकर्षण’ महसूसता हूँ ” |
  बेटे विज का सच  सुनकर माँ चुप हो  गई |
** डॉ रमा द्विवेदी **
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Posted by: ramadwivedi | अगस्त 31, 2018

पूर्वाभास -लघुकथा

पिता ने अपनी बड़ी बेटी से सुबह -सुबह अपने सपने की  बात बताई -“ अपूर्वा    को पुत्र  पैदा हुआ है | तुम्हारी माँ सपने में आकर बोली   कि   वह अपूर्वा  के  घर आ  गई  है | जब मैने पूछा -बारह  वर्षों तक  तुम   कहाँ थीं ? तो कहने लगी मैं कहीं और थी पर वहाँ मेरा मन नहीं लगा | अब में अपूर्वा  के  घर आ गई हूँ | मैं अब उस के  पास ही रहूँगी” |
गाँव में फोन नहीं था इसलिए जब पिता  जी  को अपूर्वा   का पत्र मिला तो पूर्वाभास  की  पुष्टि हो गई और उनका  सपना सच हो गया |
 जब पिता जी  के सपने की  बात पत्रोत्तर  से  अपूर्वा   को  पता चली  तो वह खुद से पूछने लगी  -“ क्या  पूर्वाभास सच होता है, हाँ पूर्वाभास सच होता है ” ?
** डॉ रमा द्वेवेदी **

 

 

Posted by: ramadwivedi | अगस्त 14, 2018

-दोहे –

1 –
जीवन में है छाँव कम, और अधिक है धूप।

काँव-काँव चहु ओर है, मिली न शांति अनूप।।
2 –
तात बिना सूना हुआ ,मेरे मन का गाँव |
  ढूँढा मैंने बहुत पर ,मिली न शीतल छाँव ||
3 –
अम्मा  के न रहने पर  ,खत्म हुई हर आस|
जीवन भर को मिल गया ,नैहर से वनवास ||
4 –

जीवन दे विष पी रही , साँस -साँस  में आह |

माँ की पीड़ा से हुई , संतति लापरवाह ||

5 –

राग- द्वेष ने कर लिया,जीवन पर अधिकार |

अब तो माधव  आइए , डूब रही पतवार  ||

**डॉ. रमा द्विवेदी **

 

 

 

 

 

 

Posted by: ramadwivedi | अगस्त 14, 2018

-कुछ दोहे –

1 –
जीवन में है छाँव कम, और अधिक है धूप।

काँव-काँव चहु ओर है, मिली न शांति अनूप।।
2 –
तात बिना सूना हुआ ,मेरे मन का गाँव |
  ढूँढा मैंने बहुत पर ,मिली न शीतल छाँव ||
3 –
अम्मा  के न रहने पर  ,खत्म हुई हर आस|
जीवन भर को मिल गया ,नैहर से वनवास ||
4 –

जीवन दे विष पी रही , साँस -साँस  में आह |

माँ की पीड़ा से हुई , संतति लापरवाह ||

5 –

राग- द्वेष ने कर लिया,जीवन पर अधिकार |

अब तो माधव  आइए , डूब रही पतवार  ||

**डॉ. रमा द्विवेदी **

 

 

 

 

 

Posted by: ramadwivedi | अगस्त 14, 2018

कुण्डलियाँ

1 –
शादी करते हैं सभी , फिर कहते हैं भूल |
रोज -रोज हर बात से, मुझे चुभाते शूल ||
मुझे चुभाते शूल , उठा घर सर पर लेते |
और सदा बिन बात, हमें ही ताने देते ||
पाकर हम संताप, सदा ही आहें भरते ||
मन में उठे सवाल ,लोग क्यों शादी करते??
2 –
शादी की इक भूल से , हुए बहुत बर्बाद |
सुख -सुकून सब खो गया,रहे न अब आज़ाद | |
रहे न अब आज़ाद, सास सौ काम बताती |
ननद -जिठानी खूब, हुक्म दे हमें सताती ||
पिया घूमता रोज, पहन के टोपी खादी |
बचे न कुछ अहसास , हुई है जब से शादी ||

**डॉ. रमा द्विवेदी **

 

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