Posted by: ramadwivedi | अप्रैल 3, 2019

`अर्थ’ पर कुछ दोहे

1 –
धन से यह जीवन चले , धन से ही भगवान |
धन के बिन कब हो सका ,मानव का सम्मान ||
2 –
धन अर्जन की दौड़ में , खड़े रहें गोविन्द |
जग का वे पोषण करें ,मानव हो खग-वृन्द ||
3 –
पैसे से घरबार है , पैसा विश्व प्रधान |
पैसे से जीवन चले ,पैसे से श्मशान ||
4 –
अर्थ संचलित जगत यह ,अर्थ स्वाचलित स्वर्ग |
अर्थ ,अर्थ ,बस अर्थ है , जीवन इक संसर्ग ||
5 –
धन-देवी चंचल बहुत , टिके नहीं इक गाँव |
लाख तिजोरी में रखो , रुके नहीं इक ठाँव ||
** डॉ. रमा द्विवेदी **

@सर्वाधिकार सुरक्षित

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Posted by: ramadwivedi | अप्रैल 3, 2019

मानसिक शांति -लघुकथा

“प्रणीता तुमने ऐसे आदमी से शादी क्यों कर ली जब तुम्हें शादी से कुछ घंटे पहले ही यह पता चल चुका था कि उसे `स्नायु कंपन’ (parkinson’s desease ) की लाइलाज बीमारी है ”? मैंने अपनी सहकर्मी से पूछा |
“ कुछ विवशताएँ थीं जिसके कारण मैंने यह शादी कर ली ”| प्रणीता ने कहा |
“ ऐसी भी क्या विवशता थी कि तुमने जानबूझ कर पूरी ज़िंदगी भर का दर्द स्वीकार कर लिया ”| मैंने पूछा |
“ मैं नर्क से मुक्ति पाना चाहती थी ”| प्रणीता ने कहा |
“ कैसा नर्क ? तुम तो अपने भैया -भाभी और माँ के साथ रहती थीं और नौकरी भी तो करके अपनी आमदनी घर को देती थीं | सच -सच बताओ ऐसा क्या गम था जिसने तुम्हें इतना कठिन निर्णय लेने के मजबूर कर दिया ”| मैंने पूछा |
“ पिता जी के गुजरने के बाद मैं और मेरी माँ भाभी को बोझ लगने लगे थे | वह हर रोज कलह करती और हम दोंनो को अपशब्द बोल -बोल कर बहुत ही अपमानित करती | दहेज़ देने की सामर्थ्य मेरे भाई में नहीं थी इसलिए मेरी शादी नहीं हो पा रही थी और शादी की उम्र भी निकली जा रही थी | मैं रोज -रोज की कलह से बहुत तंग आ गई थी इसलिए मैंने मानसिक और शारीरिक रूप से अस्वस्थ्य व्यक्ति से विवाह कर लिया | कम से कम मुझे उस नर्क से तो मुक्ति मिल गई | अब जीवन में शांति है क्योंकि पति शारीरिक रूप से असमर्थ अवश्य है लेकिन दिल से अच्छा इंसान है |अब मैं अपने जीवन और अपने घर की स्वयं मालकिन हूँ| `मानसिक शांति’ की उपलब्धि कुछ कम तो नहीं होती ”?
“ धन्य हो प्रणीता ! कुंवारी पत्नी रहकर भी तुमने जीवन को सोचने -समझने की एक नई दृष्टि प्रदान की ”| मैंने कहा |

**डॉ. रमा द्विवेदी **

@सर्वाधिकार सुरक्षित

Posted by: ramadwivedi | मार्च 27, 2019

अंतिम निर्णय -लघुकथा

पड़ोसन की बेटी जूली का प्रेम लवलीन से था और माँ बाप ने दोनों के प्रेम को स्वीकृति देते हुए उनकी सगाई भी कर दी थी | शादी की तारीख भी तै हो गई थी लेकिन अचानक ही एक दिन जूली का कै – दस्त की गंभीर शिकायत हुई | अपने परिवार के डॉक्टर को दिखा कर उसने दवा ले ली | पर पता नहीं क्या हुआ ? कै -दस्त तो बंद हो गए लेकिन जूली पूरी तरह से अंधी हो गई |
शादी रोक दी गई| बहुत इलाज करवाया गया लेकिन जूली की आँख की रोशनी वापस नहीं आई |
“जूली मैं अब भी तुमसे ही शादी करना चाहता हूँ बस तुम हाँ कर दो”| लवलीन ने कहा |
“ अब मैं तुमसे शादी नहीं कर सकती लवलीन अगर तुम चाहो तो मेरी छोटी बहन से शादी कर सकते हो ”|
“नहीं मैं उससे शादी नहीं कर सकता क्योकिं मैं तुमसे प्रेम करता हूँ ”|
“मैं तुमसे अब शादी नहीं कर सकती क्योंकि मैं जीवन भर तुम्हारी दया का बोझ नहीं उठा पाऊँगी | यह सच है कि हम प्रेम करते थे लेकिन अब स्थितियाँ बदल गईं हैं | प्रेम भावना प्रधान अवश्य होता है लेकिन जीवन सिर्फ भावुकता से नहीं चल सकता और अब शादी न करने का यह मेरा अंतिम निर्णय है ”| जूली यह कहकर चुप हो गई |

-डॉ. रमा द्विवेदी

@सर्वाधिकार सुरक्षित

Posted by: ramadwivedi | मार्च 27, 2019

होली पर घनाक्षरी

अंग-अंग ले उमंग ,पी के भंग हो मलंग,
झूमें जैसे हो मतंग, आयो छैल- छबीला ।
मारी भर पिचकारी , भींगीं अंगिया औ’ सारी,
सास -नंद देत गारी, लाल ऐसो रंगीला।।
लेके टोली हुरियारे, फिरें गली – गलियारे ,
धूम मची द्वारे -द्वारे , चितचोर सजीला ।
मल मल रंगे गात , देते प्रेम की सौगात ,
रंगों की है बरसात , आयो रंग रसीला ।।
**डॉ. रमा द्विवेदी **

@सर्वाधिकार सुरक्षित

Posted by: ramadwivedi | मार्च 27, 2019

चुनाव प्रचार -लघुकथा

“मालिक हम एक महीने की छुट्टी चाहते हैं ” मंगू ने कहा |
“क्यों चाहिए तुम्हें छुट्टी ? देखते नहीं फसल कटने के लिए तैयार खड़ी है | खेत में काम कौन करेगा” ? मालिक ने कहा |
“मालिक हम चुनाव में एक पार्टी का प्रचार करेंगे तो बिना मेहनत हमरी नगद कमाई भी ज्यादा होगी और खाना -शराब भी मुफ्त मिलेगा ,हम एक महीना खेत में काम नहीं करेंगे ”| मंगू ने कहा |
“चुनाव प्रचार का काम तो पाँच साल में एक दो बार ही मिलता है ,खेत का काम तो हमेशा मिलता है | यदि काम नहीं मिला तो खाओगे क्या ”? मालिक ने अंतिम तीर छोड़ते हुए कहा |
“मालिक जीवन के कुछ दिन हम भी ऐश करके जीना चाहते हैं ,जो भी हो , हम चुनाव प्रचार में जरूर जायेंगे और खेत की मजदूरी से तो कई गुना ज्यादा ही कमाएंगे ”| मंगू ने साफ -साफ कहा |
“मालिक उसका मुँह ताकता रह गया ”|

** डॉ. रमा द्विवेदी **

@सर्वाधिकार सुरक्षित

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