Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | जून 23, 2022

सेदोका

1 -बूँद हूँ तो क्या

खुद  को आजमाती 

सागर  में  समाती  

बनके भाप 

आसमां उड़ जाती 

बूँदों में ढल जाती | 

2 –

मित्र पुराना 

सदा साथ निभाता 

बचपन मुस्काता  

खेल- खेल में 

खूब खिलखिलाता 

यही है सच्चा नाता | 

3-

शीत  की रात 

ठिठुरता चन्द्रमा 

तलाशता चंदा को 

पारा लुढ़का 

कंपकंपाती धरा 

सूर्य लापता  | 

 4 –

परहिताय 

नीम का अंग- अंग 

हर पल मुस्काता 

स्वयं  को भूल 

सबको छाँव देता 

सदा नेह निभाता | 

5 –

जानते सब 

अर्थ का चमत्कार 

 न करते  इंकार 

अर्थ ही प्राण 

अर्थ ही भगवान 

मान चाहे न मान | 

6 –

रौंद ही डाली 

भारतीय संस्कृति 

पाश्चात्य सभ्यता ने 

कैसे बचेगी 

स्नेहिल सद्भावना 

भ्रमित युवा पीढ़ी | 

7 –

मन में वास 

ढूँढता क्यों बाहर 

अंतर्मन में झाँक 

मिलेगा वहीं

पहचान पाओगे 

बुद्ध बन जाओगे  | 

8 –

चिदानंद ही 

अनुभूति कराता 

विराट दर्शन दे 

वो समझाता  

देता दिशा निर्देश 

सही राह दिखाता |   

9 –

कण- कण में 

 गूँजता  है संगीत 

उस दिव्य सत्ता का 

अज्ञान मन 

कहाँ समझ पाता 

अव्यक्त परिभाषा | 

10 –

आवागमन 

सब कर्मों का फेरा 

जन्म जन्मान्तर से 

अवतरण 

अनंत का  विस्तार 

 क्या कोई  जान पाया | 

11 –

साधक बनो 

साध लो इन्द्रियों को 

तब जान पाओगे 

वो  है  भीतर 

भटकता बाहर 

कस्तूरी मृग जैसा | 

12 –

जग साकार 

पर वो निराकार 

कण- कण में व्याप्त 

माया अपार 

सबमें है समाया 

क्या कोई देख पाया | 

13 –

भोगी व योगी 

तपस्या में तल्लीन  

दोनों रस विलीन 

फर्क इतना 

भोगी भोग में रमा 

योगी योग  समाया  | 

14 –

क्या है तुम्हारा 

पाया सब यहीं पे 

खोना भी सब यहीं 

सोच समझ 

कर्म साथ जाएगा 

सब छूट जाएगा | 

15 –

संत है वही 

त्याग दे जो इच्छाएँ 

सुख -दुःख से परे 

संत कहाए 

प्राप्त करता मोक्ष 

योग समाधि लेता | 

16 –

नश्वर देह 

किसलिए संग्रह 

त्याग दे सब मोह 

आत्मा की सुन 

परमात्मा को गुन 

दिव्यात्मा में हो लीन | 

17 –

दिव्य दृष्टि से 

होती है अनुभूति 

खुलता है त्रिनेत्र 

मृत्यु शाश्वत 

सद्कर्म की तरिणी 

करती  भवपार | 

18 –

सुख का जादू 

अतिशय लुभाता 

मोह है भटकाता 

दुःख जोड़ता 

उस दिव्य शक्ति से 

ईश्वर की भक्ति से | 

19 –

जीवन -मृत्यु 

दोनों शाश्वत सत्य  

जीवन अवतरण  

माया  मोहती   

जीव को भटकाती 

सुकून कहाँ  पाती | 

20 –

करुणामय 

आश्रित है तुम्हीं पे  

यह सारा संसार 

राम का नाम

करता भवपार 

खुलता मोक्ष द्वार | 

21 –

क्षितिज पार 

कैसा होगा संसार 

जिज्ञासा है अपार 

पूर्णानंद का 

जगती  में  विस्तार 

साकार -निराकार | 

22 –

पीड़ा में तप 

मन बने कुंदन 

मिटें  दुःख – क्रंदन 

दुःख अथाह 

पर पा लेगा  थाह 

भक्ति सिंधु में डूब | 

23 –

अहं  डुबाता 

भवसागर पार 

राम नाम कराता 

कामना वश 

करते मनमानी 

जो हैं  मूर्ख अज्ञानी | 

24 –

टूटा विश्वास 

कोरोना से मुक्ति की 

बची क्या कोई आस 

कोरोना बोला 

मदिरालय चल 

वहीं मुझसे मिल | 

25 –

जो है अपना 

मन का है सपना

सब छूट जायेगा 

मोह न कर 

प्रभु का ध्यान कर 

भक्ति में डूब कर | 

-डॉ. रमा द्विवेदी 

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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | जून 23, 2022

ग्रीष्म-दोहे 

1-

भीषण गर्मी में पके,  मीठा हो तब आम।

कुहू- कुहू कर कूकती, लेके पिय का नाम ।।

2-

जीव- जंतु बेचैन हैं, सूख गए सब ताल।

बरसो बदरा झूम कर, जीवन हो खुशहाल।।

3

सूरज दादा तड़पते , हो गर्मी से लाल।

जाएँ  किसकी शरण में ,सागर भरे उबाल।।

4-

दरक- दरक रोई  धरा , बदरा करे निहोर | 

कब आओगे आंगना, तड़प रहा हिय मोर।।

5-

वर्षा बिन सम्भव नहीं, कैसे हो कम  ताप।

सागर जल भी उड़ रहा, बन बन करके भाप।।

6 – 

सहना पड़े किसान को ,हर मौसम की मार | 

साँस -साँस में आह  है , प्रभु कर दें भव पार || 

7 –

मौसम के हर ज़ुल्म को, सहता  सदा  गरीब | 

हे प्रभु कुछ तो कीजिये ,उनका खिले नसीब || 

~ डॉ. रमा द्विवेदी

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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | जून 23, 2022

ग्रीन लाइट-लघुकथा 

दृश्य एक : 

मुझे पता है कि मि. चतुर्वेदी कुछ ही समय पहले गुजर चुके हैं फिर भी उनकी फेसबुक आई डी में जब ग्रीन लाइट  देखती हूँ  तो  मेरा मन बरबस उधर चला जाता है और सोचती हूँ  कि पूछूं “इनकी आई डी कौन चला रहा है ? क्या वे जीवित हैं ? फिर ख्याल को झटक देती हूँ कि होगा कोई उनका अपना|”  

दृश्य दो : 

मुझे पता नहीं है कि डॉ मिश्र दो वर्ष पहले ही गुजर चुके हैं | उनसे मेरा परिचय एक दशक पहले बस इतना ही था कि उन्होंने मेरे हाइकु संग्रह की संक्षिप्त किन्तु बहुत ही सारगर्भित समीक्षा लिखी थी | पर हम ज्यादा  संपर्क में नहीं रहे | फेसबुक उनके जन्मदिन का  रिमाइंडर भेजता है और मैं उनके टाइम लाइन में जाकर उनकी फोटो में ग्रीन लाइट देखती हूँ और आश्वस्त होकर जन्मदिन की बधाई और शुभकामनाएँ लिख देती हूँ| कुछ घंटे बाद देखती हूँ कोई उत्तर नहीं है पर ग्रीन लाइट अब भी है | मेरा माथा ठनकता है और जब  नीचे नीचे जाकर देखती हूँ कि वे तो दो वर्ष पहले ही गुजर चुके हैं | बड़ा हास्यास्पद लगता है कि हम कितने रोबोट बन चुके हैं | हम यह जानने समझने की जहमत ही नहीं उठाते कि शुभकामनाएँ लेने हेतु  वो व्यक्ति जीवित भी है या नहीं ? मैंने बधाई का मैसेज डिलीट  करके बहुत ही दु:खी मन से  “शत- शत नमन ” लिखा पर मेरी आँखें ग्रीन लाइट में उलझी प्रश्न पूछती रहीं कि यह कब और कैसे हुआ | 

-डॉ. रमा द्विवेदी 

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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | जून 23, 2022

टैगियासुर -लघुकथा  

“भाई चालूराम जी आप मुझे अपनी हर रचना पर टैग क्यों करते हैं? “रामानंद जी ने पूछा।

“ताकि आप मेरी रचना  को पढ़ें और अपनी राय दें”। चालूराम ने कहा।

“क्या आप मेरी रचना  पढ़ते हैं? ” रामानंद ने पूछा।

“नहीं पढ़ता । तुम्हें तो सब पढ़ते हैं और कमेंट्स देते हैं पर मुझे कोई नहीं पढता  इसलिए तुम्हें टैग करता हूँ ।” चालूराम ने कहा।

“लेकिन मैं तो तुम्हें टैग नहीं करता?” रामानंद ने आखिरी पांसा फेंका।

“नहीं करते तो मैं क्या करूँ  लेकिन मैं तो टैग करता हूँ  और करूँगा।” चालूराम ने बेखौफ कहा।

“हे भगवान ! टैगियासुर से मुझे  बचाएं “। रामानंद ने कहा।

  -डॉ. रमा द्विवेदी

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Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | जून 23, 2022

यह कैसी शादी -लघुकथा 

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“ खुद से ही खुद का  विवाह यह कैसी शादी है ?”  पलक ने पद्मिनी से कहा | 

आजकल नई पीढ़ी जो न करे वो कम है | हाँ !  मैंने भी अखबार में  पढ़ा है  कि  गुजरात में एक लड़की ने खुद से ही खुद की शादी  करने का एलान किया है | सभी रस्म -ओ-रिवाज परंपरागत  ही होंगे | दुल्हन सजेगी ,खुद ही अपनी मांग भरेगी और फेरे भी होंगे पर दूल्हा नहीं होगा | वैसे उसके जीवन में एक लड़का और एक लड़की आई थी पर वो असफल रही  | सम्भवत: खुद को प्रसिद्ध करने का यह कोई नया स्टंट  हो | 

 उसका कहना है कि “प्यार में धोखा खाने से और तलाक लेने से तो अच्छा है कि खुद से ही  विवाह करो और खुद से ही प्यार करो | ”

यह एक अनोखी “सोलोगामी शादी ” सम्भवतः  देश की पहली शादी होगी  जिसे हमारे देश का कानून मान्यता नहीं  देता | पद्मिनी ने कहा | 

-डॉ. रमा द्विवेदी 

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