Posted by: ramadwivedi | जुलाई 25, 2017

कागज का  पुर्जा -लघुकथा 

 

नि:संतान नागप्पा और उसकी पत्नी सरला बहुत ही  मिलनसार थे और वे सबकी मदद करते थे | पांच भाई -बहनों के परिवार में जो भी समारोह होते दोनों सबसे आगे बढ़कर कार्यभार संभालते | इसी गुण  के कारण  वे सबके प्रिय और बहुत चहेते बन गए  थे|  उन्हें देखने से यही लगता था कि वे जीवन से बहुत संतुष्ट थे |
 नागप्पा ने अभी -अभी साठ  बसंत ही देखे थे  कि  अचानक एक दिन ह्रदयाघात  से उनका निधन हो गया | गृहणी सरला   नितांत अकेली हो गई | नागप्पा ने  जीवन निर्वाह के लिए कोई खास पूँजी भी नहीं छोड़ी थी | अर्थाभाव में  किराए का घर  खाली करना पड़ा | कोई भी नाते -रिश्तेदार मदद के लिए आगे नहीं आया|  मजबूरी  में सरला अपने जेठ -जेठानी के घर कुछ समय के लिए रहने आ तो गई लेकिन अपनी समस्याओं का हल उसे नहीं मिल सका और  एक गहन अँधेरी रात में सरला घर से चली  गई  और बस छोड़ गई “कागज का एक पुर्जा और चंद शब्द लेकिन  वह कागज़ भी उड़कर खिड़की में चिपक गया और तेज बारिश की बूँदों से शब्द धुल  गए |  लापता सरला की अनकही पीड़ा रहस्य बन कर रह गई ”|
डॉ रमा द्विवेदी
 घुँघराले  केशवाला वो  कन्हैया मुझ को भाता  है
सुशोभित अधरों  पे मुरली  प्रेम के गीत  गाता है
हों जड़ -चेतन सभी तन्मय ,सभी आनंद को पा लें
प्रेम ही प्रेम  चहुँदिशि हो , यही सबको बताता  है |
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वो काले केशों  पर देखो  मोरपंखी लगाता है
वो देता मान जीवों को ,सभी से उसका नाता है
प्रेम- स्थापना  करने  सदा आता धरा पर वो
सदा बंशी बजा कर वो , प्रेम -उत्सव  मनाता है |
** डॉ. रमा द्विवेदी **
Posted by: ramadwivedi | जुलाई 22, 2017

माया का चक्कर -कुंडलियां छंद

माया का चक्कर अजब ,भटक रहा इंसान

कोई लंदन  जा बसा , कोई  है  जापान
कोई है जापान , लौट कर देश न आता
सब कुछ लगता  दांव ,रकम मोटी तब पाता
खेल यही बेमेल ,  बना मानुष  घनचक्कर
कैसे  हो अब मेल ,अजब माया  का चक्कर |
डॉ रमा द्विवेदी

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