Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | मई 4, 2021

कोरोना त्रासदी -दोहे

1 -
हर पल जीवन मर रहा , कोरोना की मार | 
हे शिव आकर कीजिए ,इसका अब संहार ||
 2 -
जगह नहीं श्मशान में,शव के हैं अंबार|
क्रिया कर्म की आग में,दहक रहा परिवार | |
 3-
शव की  दुर्गति हो रही, घरवाले बेजार ।
हवा प्रदूषित हो रही,सारा जग बीमार || 
4-
अनगिन शव को देख कर,मन होता भयभीत।
मददगार सब लापता, दिखे न कोई मीत।।
5-
आग -आग बस आग ही,दिखती है श्मशान |
अभय दान शिव दीजिए,विलख रहा इंसान ||

 ** डॉ. रमा द्विवेदी **
@All Rights Reserved 
Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | अप्रैल 30, 2021

कोरोना से प्रश्न- लघु कथा

आज  सपने में मैंने बहुत साहस करके कोरोना से एक प्रश्न पूछ ही लिया  " तुम शादी विवाह, पार्टी , श्मशान , होटल्स, शॉपिंग सेंटर , स्कूल कॉलेज, सैलून , अस्पताल आदि सभी जगहों पर  जाते हो । घर -बाहर यहाँ  तक कि छुट्टी के दिन भी  हमें कहीं भी सुकून से नहीं रहने देते लेकिन तुम चुनाव की जगहों में क्यों नहीं जाते" ??
कोरोना बोला" तुम मूर्ख हो तुम्हें इतना भी पता नहीं  कि `` अभी मैं अट्ठारह साल का नहीं हुआ " ?
कोरोना का जवाब सुनकर घबराकर मेरी नींद  खुल गई और मैं सोचने लगी  "कहीं कोरोना यहाँ  तो नहीं आ गया "??

** डॉ. रमा द्विवेदी**
@ All Rights Reserved 

Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | अप्रैल 30, 2021

आशा पर दोहे 

1-
 संकट हो कितना मगर,रखना मन में आस|
 तन से चाहे दूर हों,पर मन से हों पास ||
 2 -
 समय कभी रुकता नहीं,इसकी गति है खास |
 समय उबारेगा हमें,रखना है विश्वास || 
3 -
गम के बादल अति सघन,होना नहीं उदास ।
सूरज नित उग के कहे,नहीं छोड़ना आस।।
4-
रखें भरोसा ईश पर,लेना हरदम सीख।
जन्म-मरण वश में नहीं,मांगे मिले न भीख ।।
5-
राम-भरोसे चल रहा,साँसों का व्यापार ।
बाबा दो आशीष अब,कर दो बेडा पार ।।

** डॉ. रमा द्विवेदी **
@ All Right Reserved 
Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | अप्रैल 30, 2021

खौफ़ पर दोहे 

1-
कोरोना के खौफ़ से,बौराए कवि-वृंद। 
महक न भाए पुष्प की, भूल गए मकरंद।।
2-
दहशत में हैं कवि यहाँ,रचते क्या -क्या  छंद।
प्रेम सुमन मुरझा गए, दिखें नहीं अलि- वृंद।।
3 -
कैसा आया दौर ये,शिथिल हुए अनुबंध |
 मददगार कोई नहीं,नीरस सब  संबंध  ||
4 -
पास -पास भी रह हुए,दूर-दूर सब लोग| 
प्रेम रंग फीका पड़ा,कैसा यह संयोग ||
 5 -
जब तक मन में डर रहे,तब तक बने न बात |
रूप बदल कर दे रहा,कोविड भी आघात  ||
  
 6-
प्रेम और सद्भाव ही,मानवता  आधार |
रखना है बस हौसला,नहीं मानना हार ||

** डॉ. रमा द्विवेदी **
@ All Right Reserved 
Posted by: डॉ. रमा द्विवेदी | अप्रैल 9, 2021

तन की असमर्थता -लघुकथा 

``तन की असमर्थता कितनी कष्टदायी हो सकती है ? यह आज मैंने शिद्दत से महसूस किया ''?  राम ने अपने मित्र अशोक से कहा | 
अशोक ने कहा -``तुम किसकी बात कर रहे हो ''?
 राम ने कहा - ``अपने बहुत सीनियर  डॉक्टर चतुर्वेदी जो विश्वविद्यालय के बहुत बड़े पद से रिटायर्ड हुए थे |
  आर्थिक रूप से पूरी तरह समृद्ध हैं | लाखों रुपया पेंसन आती है लेकिन अचानक एक दिन उन्हें पैरालिटिक अटैक आया और शरीर का आधा अंग प्रभावित हो गया | उनके जीवन की सारी सम  परिस्थितियां विषमता में ही बदल गईं | पारिवारिक रिश्तों की संवेदना   कुछ ही महीनों में  चरमरा गई  और जो अपेक्षा  वे परिवार के सदस्यों से रखते थे वो न मिलने से वे  अवसादग्रत हो गए | आज उनका  फोन आया और वे सिसक सिसक कर  रोकर कहने लगे अब मैं बचूंगा नहीं ,दूसरों पर  निर्भर होकर जीना  बहुत ही  कष्टदायी हो गया है | मैं अब मर जाना चाहता हूँ |
 मैंने उन्हें बहुत समझाया कि इतना निराश न हों आप ठीक हो जाएंगे | ईश्वर को याद करें वही आपको इस कष्ट से उबरने की शक्ति देंगे | सबसे बड़ा संबल ईश्वर ही होते हैं ''| 
उन्होंने अस्फुट शब्दों में  कहा-`` तुम ठीक कहते हो | कोई किसी का नहीं होता '' |
 उनके ये शब्द मुझे बड़ी पीड़ा दे गए | तन की असमर्थता ने उन्हें मन और धन दोनों से  असमर्थ बना दिया है | 
 अशोक ने कहा- ``यह बेहद दुखद है कि संतान  को सिर्फ दौलत चाहिए , वे  माँ -बाप की  सेवा करने में  असमर्थता जताते हैं  | इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी यही है ''| दोनों मित्र चिंता में डूब गए | 

** डॉ रमा द्विवेदी ** 
@All Rights Reserved 

Older Posts »

श्रेणी