Posted by: ramadwivedi | मई 1, 2019

-कुण्डलियाँ छंद-

बातें होतीं फूल सीं ,बातें ही हों शूल |
सहनशक्ति ही दर्द को ,करती है निर्मूल ||
करती है निर्मूल, शूल निष्फल हो जाता।
करे गरल जो पान,वही तो शिव कहलाता।
जिनपर हो विश्वास, वही करते हैं घातें।
चुभती बनकर शूल, सदा अपनों की बातें।।

*डॉ. रमा द्विवेदी *

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Posted by: ramadwivedi | मई 1, 2019

पिंड दान क्यों ?- लघुकथा

“क्या बात है अनन्या ? तुम आज बहुत दुखी लग रही हो | सब ठीक तो है न” ? मैंने अपनी मित्र से पूछा |
“कुछ ठीक नहीं है | इंसान बच्चे क्यों करता है ,इसलिए ही न कि वंश बेल आगे बढ़े | अपने बच्चों को अच्छा जीवन देने के लिए माँ -बाप क्या -क्या नहीं करते ? मैंने भी अपनी बेटियों को महंगे से महंगे स्कूल और मणिपाल विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रखकर उच्च शिक्षा दिलाई ,ताकि उनका जीवन सुखमय बन सके | जो माँगा ,जो चाहा सब हमने दिया लेकिन क्या हुआ ? बड़ी बेटी सौम्या ने नैरोबी के एक ईसाई लड़के से हमारे मना करने के बावजूद भी शादी कर ली और नैरोबी चली गई | हम ने अपने दिल पर पत्थर रख लिया कि चलो एक बेटी सौदामिनी तो हमारे पास है लेकिन वह भी एक मुस्लिम लड़के से प्यार कर बैठी और शादी करने की स्वीकृति हमसे मांगी लेकिन हमने ऊँच -नीच समझाने की कोशिश की और स्वीकृति नहीं दी , तब सौम्या ने उन दोनों की शादी करवा दी और कुछ समय के लिए अपने पास बुला लिया | फिर वे दोनों नौकरी ढूंढ कर कनाडा चले गए ” |
“हम दोनों अंदर से बुरी तरह टूट गए ,क्या यही सब देखने के लिए हमने लड़कियों को उच्च शिक्षित किया था ? यह कहकर वह फुट -फूट कर रोने लगीं और आगे बोली अब हमने अपनी बेटियों से नाता तोड़ लिया है | हम दोनों `गया’ जाकर जीते जी अपना पिंडदान कर आये हैं ,क्योंकि हमारा अब इस दुनिया में कोई नहीं है ”| यह कहते हुए उसके चेहरे पर अत्यधिक पीड़ा उभर आई |
उसकी बात सुनकर मैं भी सोचने लगी कि नई पीढ़ी कितनी स्वार्थी हो गई है कि माँ -बाप की भावनाओं का अब कोई मूल्य ही नहीं रहा | सबसे ज्यादा दुःख इस बात का हुआ कि बेटियों ने भी अपने माँ -बाप के दर्द को नहीं समझा | क्या परवरिश में दोष है या आधुनिकता की हवा सबको लग रही है ”? उसको समझाते हुए मैंने कहा -“लेकिन आपने पिंडदान क्यों किया ”?
“पिंडदान करने के बाद आदमी मृतक के समान जीवन जीता है ,हम तो जीते जी मर ही चुके हैं ,इसलिए हमने अपना पिंडदान खुद करवा दिया कि शायद मरने के बाद हमें सद्गति मिल सके ”| अनन्या ने कहा |
मैं भी निरुत्तर होकर युग सत्य के गहरे चिंतन में डूब गई |

**डॉ. रमा द्विवेदी **

“व्याकरण किसे कहते हैं ” ? पत्रकार ने हिंदी के टीचर से पूछा |
“टीचर ने कोई उत्तर नहीं दिया और पत्रकार को धकिया कर कक्षा से बाहर चला गया ”|
“संज्ञा किसे कहते हैं ”? पत्रकार ने महिला टीचर से पूछा |
“महिला टीचर बगले झांकने लगी और फिर बोली हमें सब मालूम रहा लेकिन अब हम सब भूल गइल हैं क्योंकि चार महीने पहले हमरा ऑपरेशन भइल बा” |
“बिहार का मुख्य मंत्री कौन है ”? पत्रकार ने तीसरी महिला टीचर से पूछा |
“ नरेंद्र मोदी ” महिला टीचर ने उत्तर दिया ”?
“स्कूल अंग्रेजी में लिखकर बताओ ”| पत्रकार ने इंग्लिश टीचर से कहा |
“ scull ” टीचर ने लिख दिया |
“ देश कब आज़ाद हुआ था ”? पत्रकार ने पूछा |
“देश उन्नीस सौ अठ्ठावन में आज़ाद हुआ था ”| महिला टीचर ने उत्तर दिया |
“ पंद्रह अगस्त क्यों मनाते हैं ”? स्कूल की की प्रभारी से पत्रकार ने पूछा |
“ हमें मालूम है पर हम न बताइबे ”| हँसते हुए यह कह कर बड़े ठसके से वह राउंड पर चली गई |
“पत्रकार ने सरकारी स्कूल के टीचर्स का सामान्य ज्ञान देख कर अपना माथा पीट लिया और दूसरे दिन अखबार में छाप दिया देश के नौनिहालों का भविष्य घोर अंधकारमय है , सरकार देश के गिरते शिक्षा स्तर पर कब ध्यान देगी ? `सबका साथ और सबका विकास’ का सपना क्या उचित शिक्षा के बिना कभी पूरा हो पायेगा ”??

** डॉ. रमा द्विवेदी **

Posted by: ramadwivedi | मई 1, 2019

सूर्य पर दोहे

1 –
स्नान -ध्यान कर आ रहा , लेकर उजली भोर |
दस्तक दे दिनकर करे , सबको नमन निहोर ||
2 –
अंगड़ाई लेती धरा , मन में नई उमंग |
अठखेली सागर करे, खुशियों भरी तरंग ||
3 –
नभ में लाली छा गई, बिखरा रंग गुलाल |
फगुआ खेलन आ गया, लेकर ग्वाल- गुपाल ||
4 –
सूरज करता है सदा, नव ऊर्जा संचार |
इसके बिन संभव कहाँ,जीव-जगत -संसार ||
5 –
धरती -नभ का क्षितिज पर ,मिलन लगे अभिसार |
अद्भुत मनभावन लगे , किसन -राधिका प्यार ||

-डॉ. रमा द्विवेदी

Posted by: ramadwivedi | मई 1, 2019

लोभ /लालच पर दोहे

1 –
काम ,क्रोध ,मद ,लोभ का , यह जीवन आगार |
निर्मल मन कब हो सका ,पल -पल करते वार ||
2 –
लालच देकर ही सदा ,नेता मांगे वोट |
ऊपर से भोले लगें ,मन में रखते खोट ||
3 –
लालच वश ही कर रहे , क्या -क्या यहाँ कुकर्म |
नेताओं का बन गया , जीवन का यह धर्म ||
4 –
सत्ता का मद चढ़ गया , भाषा हुई अपंग |
लालच की हद हो गई , शब्द हो गए तंग ||
5 –
वैतरिणी में लोभ की , डूब रहा संसार |
हे प्रभु जल्दी आइये ,करिये अब उद्धार ||

** डॉ. रमा द्विवेदी **

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