Posted by: ramadwivedi | सितम्बर 17, 2016

दिल यह कहता है -कविता

मेरा दिल तो यह कहता है,
सच सहमा -दुबका रहता है।
है बडबोलों का राज यहाँ,
सच ही तो हरदम सहता है।

जग की कैसी है रीत यहाँ
झूठों से होती है प्रीत यहाँ
इस मन भरमाती दुनिया में
सच का न कोई मीत यहाँ।

जब भी सच ने हुंकार भरी

झूठों के सर पर गाज गिरी

शकुनि का खेल निराला था

केशव  ने दे दी मात बड़ी ।

दिल की अपनी आवाज सुनो

कहने से पहले  बात  गुनो

जीवन का सार इसी में है

दूजे का न अधिकार हनो ।

दिल का सच गर आ जाए समझ
दुविधाएं सारी जाएं सुलझ
जीवन सुंदर से सुंदरतम हो
चिंतन सबका हो जाए सहज।

डॉ.रमा द्विवेदी

Posted by: ramadwivedi | अगस्त 31, 2016

अहंकार -लघु कथा

सीता और रीता दोनों सगी बहनें  थीं  । दोनों उच्च शिक्षित थीं पर जीवन निर्वाह के प्रति दोनों की सोच अलग-अलग थी ।सीता घर की सुख शान्ति को महत्व देती और रीता अर्थ  को ज्यादा महत्व देती ।रीता का कहना था कि पैसे से सब  कुछ पाया जा सकता है सुख ,शांति और भौतिक सुविधाएँ भी । रीता इंजीनियर थी,पति से भी कुछ अधिक कमाती थी बस इसी वजह से उसमें अहंकार और भी अधिक आ गया और वह बात-बात पर पति को ताने मारती।कुछ समय तक पति सहता रहा क्योंकि यह प्रेम विवाह था । रीता ने पति श्लोक को पहले तो उसके माँ -बाप से अलग किया फिर अलग रहने के कारण वह  और  भी स्वच्छंद  हो गई । श्लोक से घर के काम करवाती और वह करता भी सिर्फ इसलिए कि घर में सुख शांति बनी रहे क्योंकि वह पत्नी को दिल से  बहुत चाहता भी था ।उसे भ्रम था कि रीता भी उससे उतना ही प्यार करती है ।रीता का अहंकार इतना बढ़ा कि श्लोक से भी उसकी न बनने  लगी । सीता ने उसे बहुत समझाते हुए कहा “ पैसे को इतना महत्व मत दो ,श्लोक के प्यार को देखो ,वह कितना सज्जन है ,तुम्हारी हर बात मानता  है ,आजकल ऐसा पति मिलना दुर्लभ है । पैसा बहुत कुछ होता है पर सब कुछ नहीं होता ”।

 रीता ने सीता की एक न सुनी ,उसे सीता बहुत ही दकियानूसी विचारोंवाली लगती । सीता ने अपने बच्चे की सही परवरिश करने के लिए सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी छोड़ दी और घर से ही कुछ काम करके अपने पति को घर चलाने में आर्थिक सहयोग करने लगी । सीता ने अपने बच्चे को महत्व दिया पैसे कमाने के पीछे नहीं भागी और पति और बच्चे के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताने लगी लेकिन रीता के अत्यधिक अहंकार के कारण  रीता और श्लोक के बीच झगड़े बढ़ते  गए और एक दिन रीता ने  श्लोक को दोटूक कह दिया मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना,मुझे तुमसे तलाक चाहिए । श्लोक के  अहम् को बहुत चोट लगी और उसने भी कह दिया ,“मुझे भी अब तुम्हारे साथ नहीं रहना ”। दोनों  ने  गंभीरता  से सोचे समझे  बिना जल्दबाजी में  तलाक तो ले लिया लेकिन श्लोक अभी भी उसे भूल नहीं पाया ।

डॉ रमा द्विवेदी

Posted by: ramadwivedi | अगस्त 31, 2016

घिनौनी सोच -लघुकथा

 

सत्यभामा `महिला क्लब’ चलाती थी और समाज की कमजोर स्त्रियों को आगे बढ़ाने का ढोंग करती थी । भ्रूण हत्या और घरेलू हिंसा पर बड़े -बड़े भाषण देती थी । अमीर लेकिन बुद्धिहीन स्त्रियों में उसकी   अच्छी खासी पकड़ थी । हर स्त्री उनके चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेती थीं और जब – जब वे कहती चढ़ावा भी चढ़ाती  थी ।
मिताली इस शहर में नई  -नई  आई थी । पढ़ने -लिखने के शौक के कारण संस्थाओं की तलाश में लग गई और उसका संपर्क सत्यभामा से हो गया । मिताली पहली बार मिलकर सत्यभामा के व्यक्तित्व  से बहुत प्रभावित हुई और यह परिचय घनिष्ठ मित्रता में बदल गया  ।
  एक दिन वह सत्यभामा के घर किसी काम से गई थी ।तब उसने  देखा  कि उनके घर पर एक तेरह -चौदह साल की लड़की  बहुत उदास मन से काम कर रही थी । उसने  पूछा “यह लड़की आपको कहाँ मिली ,तब उसने बताया कि इसके माँ बाप ने हमसे पच्चीस हजार रूपये लेकर इसे तीन साल पहले  हमारे पास छोड़ दिए है ,यह यही रहती है और घर का सब काम यही करती है” ।
तभी उनकी बहू ने आकर कहा  माँ  “ लक्ष्मी  ,की माँ  बहुत बीमार है ,वह देखने के लिए एक दिन की छुट्टी  चाहती है ,जाने दूँ उसे ,तभी सत्यभामा लगभग चीख कर बोली ,नहीं जाने  देना , माँ मर नहीं  जायेगी ,यहां काम कौन करेगा उसका बाप काम करेगा क्या ? ”
     एक अबोध- निर्धन  लड़की के प्रति  सत्यभामा की ऐसी असंवेदनशील घिनौनी   सोच और  वीभत्स रूप को  देख कर मिताली का दिल -दिमाग बुरी तरह हिल गया और उसके दिल में अंकित सत्यभामा की  छबि पलभर में  खंड -खंड हो धूल  धूसरित हो गई ।
डॉ रमा द्विवेदी

 

1 -मेरा देश है प्यारा मुझको ,यह मेरी पहचान है
 इससे ही  है वजूद  मेरा,आन,बान और शान  है
 सीमा में प्रहरी बन तत्पर रक्षा में तैनात खड़े जो
 बारम्बार नमन करते  , उनसे ही देश महान  है ।
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2 -आज़ादी का मर्म न समझा ,बदल गया इंसान है
केवल आपहि  आप चरे , वो मानुष पशु समान है
भूल गए  आचार संहिता , मैं ,मैं ,मैं का जाप करें
सारे नियम ताक में रख, खुद बन बैठा भगवान है ।
डॉ रमा द्विवेदी

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