अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

परिभाषाएं अलग-अलग

       हर एक के सुख की परिभाषाएं अलग होती हैं,
       सभ्यता का पाठ पढानें वाली पाठशालाएं अलग होती हैं।
        अनुभव प्राप्त करने की कार्यशालाएं अलग होती हैं,
       जो प्रेम में सराबोर कर दें,वे मधुशालाएं अलग होती हैं॥

        कोई अध-छलकत गगरी बन इतराता है,
       कोई आसमां को छूकर भी झुक जाता है।
        कोई दूसरों को मिटा करके सुख पाता है,
       कोई दूसरों को बसाने में मिट जाता है॥

        कोई सुख-सुविधाओं में रम जाता है,
       कोई दौलत कमाने में खट जाता है।
        कोई आत्म्सम्मान लुटा करके कुछ पाता है,
       कोई आत्म्सम्मान बचाने में मिट जाता है॥

        कोई खुश है परिश्रम की रोटी कमाकर,
       कोई खुश है हराम की कमाई पाकर।
        कोई खुश है बैंक बैलेन्स बढाकर,
       कोई खुश है अपनी पहचान बनाकर॥

       डा. रमा द्विवेदी

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October 27, 2006 - Posted by ramadwivedi | संवेदना की अनुभूतिय | | 5 Comments

5 Comments »

  1. और हम खुश हैं आपकी रचनाएँ पढ़कर॰॰॰॰ :)

    लिखते रहियेगा!!!

    Comment by गिरिराज जोशी | October 27, 2006

  2. सुंदर भाव हैं, बधाई.

    Comment by समीर लाल | October 27, 2006

  3. कोई अध-छलकत गगरी बन इतराता है,
    कोई आसमां को छूकर भी झुक जाता है।
    कोई दूसरों को मिटा करके सुख पाता है,
    कोई दूसरों को बसाने में मिट जाता है॥
    बहुत गहरी बात कही है आपने।

    Comment by ratna | October 27, 2006

  4. कोई खुश है अपनी पहचान बनाकर ।

    विचारणीय एवं यथार्थ रचना ।
    सधन्यवाद ।।

    Comment by Prabhakar Pandey | October 28, 2006

  5. बहुत सुन्दर कविता, साधूवाद!

    Comment by सागर चन्द नाहर | October 28, 2006

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