अनुभूति कलश

अहसासों को संजोया है मैंने, अनुभूतियों को पिरोया है मैंने, बने सत्य,शिव, सुन्दरम यह कलश, मानस की गंगा में धोया है मैंने..

पत्थर युग में/ उडने की कोशिश

 १-        पत्थर युग में

          ऐसा लगता है हम
          पत्थर युग की ओर
          धीरे-धीरे सरक रहे हैं।
          अच्छा है अगर,
         अगर सब पत्थर बन जाएं
          कम से कम ऊंच-नीच की खाई तो
          पट जायेगी
          और भावनाएं इस तरह
          लहूलुहान तो नहीं होंगी॥

 

   २-     उडने की कोशिश

          चिडियों की ऊंची और ऊंची
          उडने की कोशिश भी
          आकाश को छू नहीं पातीं
          पर इसका अर्थ
          यह कतई नहीं
          कि वे उडना छोड दें॥

         डा. रमा द्विवेदी

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December 2, 2006 - Posted by ramadwivedi | क्षणिकाएं | | No Comments

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