स्वयं ही रणचंडी बनना होगा

स्वयं ही रणचंडी बनना होगा

स्त्री के मन को इस देश में,

कोई न समझ पाया है?

कितना गहरा दर्द,तूफ़ान समेटे है,

अपने गर्भ में,मस्तिष्क में,

उसकी उर्वर जमीन में,

बीज बोते समय

तुमने न उसे खाद दी ,

न जल से सींचा,

अपने रक्त की हर बूँद से,

उसने उसे पोसा,

असंख्य रातें जगी,

दुर्धर पीड़ा सहकर,

उसने तुम्हें जन्मा,

किन्तु उसे ही कोई न समझ पाया?

जिसने मानव को बनाया।

बीज काफी नहीं है,

अगर भूमि उर्वरा न हो,

तो बीज व्यर्थ चला जाता है,

उसके तन-मन-ममत्व की आहुति से,

कहीं एक शिशु जन्मता है,

पोषती है अपने दुग्ध से,

असंख्य रातें जागकर,

अनेक कष्ट सहकर,तब-

उस शिशु को आदमी बनाती है,

फिर क्यों समाज में,

उसे ही नकारा जाता है?

रसोई और बिस्तर तक ही,

उसके अस्तित्व को सीमित कर,

उसे कैद कर दिया जाता है।

खुली हवा में साँस लेने का,

उसे अधिकार नहीं,

आसमान का एक छोटा टुकड़ा भी,

उसके नाम नहीं । क्यों?

यह पुरुष, जिसकी हर साँस

उसकी ही दी हुई है,

वही उसकी अस्मिता से

हर पल खेलता है,

कभी दहेज की बलि  चढ़ा कर?

कभी बलात्कार करके?

कभी बाजार में बेंच कर?

कभी भ्रूण-हत्या करके?

क्या हमारे देश के पुरुष ,

इतने कृतघ्न हो गए हैं?

कि अपने समाज की स्त्रियों की,

रक्षा नहीं कर सकते।

जब रक्षक ही भक्षक बन जाए ,

तब रक्षा का दूसरा उपाय ही क्या है?

जब स्थिति इतनी विकट हो ,

तब नारी को स्वयं ही ,

रणचंडी बनना होगा,

येन-केन-प्रकारेण उसे स्वयं ही,

अपनी अस्मिता की रक्षा करनी होगी।

क्योंकि इस देश में हिजड़ों की,

संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है,

और हिजड़ों की कोई पहचान नहीं होती।

डा.रमा द्विवेदी

वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेन्द्र अवस्थी जी नहीं रहे

मध्य प्रदेश के गढ़ा जबलपुर मे २५ जनवरी १९३० को जन्में श्री राजेन्द्र अवस्थी वर्तमान मे` ऑथर्स गिल्ड  ऑफ  इंडिया ’ के जनरल सेक्रेटरी थे ।  नवभारत,सारिका ,नंदन,साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के आप संपादक भी रहे हैं। आपकी चर्चित कृतियों में `सूरज किरण की छाँव,जंगल के फूल,जाने कितनी आँखें,बीमार शहर,अकेली आवाज,मछली बाजार(उपन्यास)मकड़ी के जाले,दो जोड़ी आँखें,मेरी प्रिय कहानियाँ (कहानी संग्रह) उतरते ज्वार की सीपियाँ,एक औरत से इन्टरव्यु और दोस्तों की दुनिया उनके काव्य संग्रह हैं। `जंगल से शहर तक’ उनके द्वारा लिखा गया यात्रा वृतान्त  है।

दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने उन्हें वर्ष १९९७-९८ में साहित्यिक कृति से सम्मानित किया था।

३० दिसम्बर की सुबह लगभग ९.३० बजे दिल्ली के एस्कार्ट हास्पिटल में श्री राजेन्द्र अवस्थी ने अंतिम साँस ली । हिंदी साहित्य जगत ने एक कर्मठ साहित्यकार को खो दिया है यह क्षति अपूर्णनीय है ।

कादम्बिनी क्लब,हैदराबाद एवं  ऑथर्स गिल्ड  ऑफ  इंडिया के हैदराबाद चैप्टर की संयोजिका डा. अहिल्या मिश्र एवं समस्त सदस्यों की ओर से श्री राजेन्द्र अवस्थी जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

डा. रमा द्विवेदी

झूमता आया है नया वर्ष फिर

(सभी  प्रिय मित्रों को  बड़े दिन  और नववर्ष-२०१० की हार्दिक शुभकामनाएँ)

हँसता, हुलसता, झूमता आया है नया वर्ष फिर,

जीवन में खुशियाँ भरने को आया है नया वर्ष फिर।

हर घर के देहरी-द्वार पर जगमगाते दीप ऐसे,

जमीं पे उतर आए हों नभ के सभी सितारे जैसे,

चन्दा औ चाँदनी सी मचल रही यह रात  फिर

जीवन में खुशियाँ भरने को आया है  नया वर्ष फिर।

क्रिसमस ट्री बना है कल्पतरु खुशियों को है बिखेरता,

अमृत बरस रहा हो  ज्यूँ पीकर के हर मन  झूमता,

बच्चों को बाँटने खिलौने  आते  शान्ता-क्लाज फिर

जीवन में खुशियाँ भरने को आया है नया वर्ष फिर।

आशा की इक किरण से ही होता है चमत्कार यूँ,

पी लेता  अँधकार को लघु दीप का प्रकाश ज्यूँ,

कभी नहीं उतरता  यूँ जीने का यह खुमार  फिर ,

जीवन में खुशियाँ भरने को आया है नया वर्ष फिर।

नगर-नगर,गली-गली दुल्हन सी है सजी हुई,

गले में बहियाँ डाल के कली-कली खिली हुई,

मधुप के मधु-पान से लजाई नवनवेली फिर,

जीवन में खुशियाँ  भरने को आया है नया वर्ष फिर।

डा.रमा द्विवेदी

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कुछ क्षणिकाएँ ( अमेरिका की प्रकृति पर)

१-    कल यह पेड़

हरे परिधान में झूमता था

आज लाल परिधान में

खिलखिला रहा है ,

कल इसके परिधान

पीले होकर

उतर जाएंगे

और  पेड़ नग्न होकर

शर्मसार हो रहा होगा ।

२-       देखो-देखो यह दरख़्त

कितना पीला पड़ गया है?

इस भय से कि कल वह

वस्त्रहीन हो जायेगा।

३-       प्रकृति भी परिधान

पहनती है,सजती-संवरती है

प्रतिकूल परिस्थितियों में जब

उसके परिधान  उतर जाते हैं

तब वह भी ज़ार-ज़ार रोती है।

४-      यहाँ के  दरख़्त  भी

बहुत खुद्दार हैं

अपनी विपदा पर

किसी के आगे

हाथ नहीं फैलाते।

५-      यहाँ पर आकाश

झर-झर  झरता  है,

और  धरा से लिपट,

श्वेत चादर ओढ़

सुकून से  सो जाता है।

डा.रमा द्विवेदी

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पिता की ममता (कहानी)_ डा.रमा द्विवेदी

सुनती हो दिविक ने बड़ी उदासी  भरी आवाज में पुकारा। मैं बड़ी ही तत्परता से उसके पास पहुँची और पूछा-` क्या हुआ’?

उसने बताया कि  मिसेज खरे को स्तन कैंसर है ।सुनकर मैं अवाक रह गई मुंह से बस इतना ही निकला `क्या’? मेरे आंखों के सामने मिसेज खरे का चेहरा बड़ी तेजी से घूम गया।

मिसेज मधु खरे को मैं कई बार पार्टियों में मिल चुकी थी । गोरा रंग ,आंखें हिरणी सी,सुए सी नाक,घटाओं जैसे काले -घने केश,छोटे कद की गोल-मटोल किन्तु आकर्षक महिला  थी। उनके दो बच्चे रेश्मा एवं रोमित थे । दोनों बच्चों में आयु अन्तराल बहुत कम था इसलिए  दोनों बच्चे  किसी न किसी बात को लेकर झगड़ा करके उन्हें तंग करते रहते और मिसेज खरे पार्टी का मज़ा न ले पातीं और बच्चों को संभालने में ही हमेशा परेशान रहतीं। उनके पति डा. एम. एम.खरे उनकी परेशानियों  से बेखबर अपने सहकर्मियों के  साथ पीने-पिलाने में मस्त  हो जाते। तरह-तरह के जोक सुनाकर खुद ठहाके लगाते और उनके सहकर्मी भी उनका साथ देते।महफ़िल जम जाती तो फिर जल्दी उठने का कोई नाम ही न लेते लेकिन पत्नियाँ बोर हो जातीं और बच्चे थक-हारकर सो जाते।

डा. खरे बहुत बड़े पद में आसीन थे इसलिए हरकोई उनकी चापलूसी में लगा रहता। कुशाग्र बुद्धि के साथ-साथ चाटुकारिता में भी वह  अव्वल थे इसलिए तो बहुत कम समय में ही ख्याति की सीढ़ियाँ  बड़ी तेजी से चढ़ गए ।पीना-पिलाना उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी।बोतल की बोतल पी जाते फिर भी उन्हें नशा न चढ़ता   और न ही  कभी उनका दिमाग संतुलन खोता लेकिन हाँ  वे अपने सहकर्मियों को खूब पिला कर उनके मन का सच अवश्य उगलवा लेते ।इससे उन्हें यह अवश्य पता चल जाता कि कौन उनके बारे में क्या सोच रहा है और  इस तरह वे अपने शत्रु और मित्र को पहचान लेते और फिर उसी के अनुसार  शोध- कार्य उन्हें सौंपते और अगर शोध कार्य वे समय से और सफलतापूर्वक करके देते तो वे उनके प्रमोशन   में भी मदद  करते। इससे उनका प्रोजेक्ट भी सही समय पर पूरा हो जाता और सहकर्मी भी खुश होकर उनके आस-पास चक्कर काटते रहते और चाटुकारिता में लगे रहते। डा. खरे कुशल निर्देशक एवं निपुण प्रशासक थे परन्तु घर के कार्यों में उन्हें कोई रुचि नहीं थी।

मिसेज खरे हमेशा खीजती रहती कि बच्चों को संभालने में कोई मदद नहीं करते लेकिन पत्नी की नाराजी का उन पर कोई असर न पड़ता। हाँ, हँस कर इतना ही कहते ‘मधु ये सब आप ही संभाल लो यह मुझसे नहीं होता । पत्नी मन मारकर रह जाती यही सोच कर सब्र कर लेती कि बाकी तो कोई कष्ट नहीं देते बाहर का काम और आफिस का काम तो बड़ी चतुरता से निपटा देते हैं।

कहते हैं ईश्वर खुशियों को अधिक दिन तक नहीं रहने देता । डा. खरे को दो वर्ष के लिए  अमेरिका का एक प्रोजेक्ट मिला ।उन्हें प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए जल्दी ही जाना था ।परिवार को भी साथ ले जाना था लेकिन जाने से पहले  डा. खरे और उनके परिवार के हर सदस्य का मेडिकल चेक-अप होना अत्यन्त अनिवार्य था । जांच करने के दौरान यह पता चला कि मिसेज खरे को स्तन-कैंसर है और उनका शीघ्र आपरेशन करना पडे़गा । मिसेज  खरे तो जैसे यह खबर सुनकर पागल ही हो  गई। दो दिन तक रो-रोकर अपना बुरा हाल कर लिया आखिर में बहुत समझाने पर आपरेशन के लिए हाँ  की ।बच्चे अभी बहुत छोटे थे । छै साल की रेश्मा और चार साल का रोमित था। वह  यही सोच कर आपरेशन कराने के  लिए राजी हुई कि बच्चों के लिए तो जीना ही पड़ेगा। उसका आपरेशन करके एक स्तन पूरी तरह  काटकर निकाल दिया गया और फिर दो केमोथेरेपी करवाने  के बाद उनके कुछ स्वस्थ्य होते ही डा. खरे सपरिवार अमेरिका चले गए ।बाकी का इलाज उनका वहीं होता रहा । शुरू-शुरू में मिसेज खरे अपने सौन्दर्य की कमी के लिए उदास रहती लेकिन शीघ्र ही उसने अपने को संभाल लिया। धीरे-धीरे उसका  जीवन सामान्य हो गया।

मिसेज खरे को जैसे इस बात का अहसास हो गया था कि अब उनके जीवन की गारंटी नहीं है इसलिए उसने अपनी बेटी और बेटे की बहू के लिए  सोने के गहने खरीदने शुरू किए चूंकि पैसों की कमी नहीं थी इसलिए उसने आवश्यकता से अधिक गहने बना दिए ।  वैसे तो सब कुछ ठीक ही चल रहा था किन्तु लगभग पाँच  वर्ष के बाद उसको फिर से कैंसर हो गया और इस बार  ऐसी जगह पर हुआ कि आपरेट भी नहीं कर सकते थे ।डाक्टरों ने कह दिया कि अगर आपरेशन करेंगे तो अभी मर सकती हैं अगर नहीं करेंगे तो हो सकता है कुछ माह ज्यादा जी सकें । मिसेज खरे की तबियत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी और एक दिन उसने बिस्तर पकड़ लिया।डा. खरे बच्चों और पत्नी की देखभाल की जिम्मेदारी संभाल नहीं पा रहे थे अत: पत्नी को उसके माता-पिता के घर और बच्चों को कोडाइकोनाल के एक रेजीडेंसियल स्कूल में एडमीशन करवा दिया । जब भी समय मिलता वह पत्नी को देखने और बच्चों से मिलने जाते।

सच में कितना मुश्किल होता है यह सह पाना कि उनकी प्रिय कुछ ही दिन में हमेशा के लिए छोड़कर चली जाएगी । कितनी असह्य पीड़ा देता है किसी की मृत्यु का इन्तज़ार। बेवश घूँट-घूँट इस पीड़ा को पीना ही पड़ता है। डा. खरे भी इसके अपवाद नहीं थे । उनकी दौलत भी उनकी पत्नी को नहीं बचा पायी।  मिसेज खरे की बीमारी असाध्य से असाध्य होती गई। उसे यह आभास हो गया कि उसकी जीवनलीला शीघ्र ही समाप्त होने वाली है तब उसने डा. खरे के सामने अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की।उसने कहा -”मेरे बच्चों को ठीक से रखना उन्हें कोई कष्ट न होने पाए और मैंने जो गहने बनवाए हैं और जो मेरे गहने हैं उन्हें मेरी बेटी को शादी के समय में दे देना और मैंने जो गहने बहू के लिए रखे हैं उन्हें बहू को दे देना । आगे उसने कहा कि वो मेरे परिवार में से अगर कोई लड़की पसन्द आए या बाहर से भी कोई लड़की पसन्द आए तो शादी अवश्य कर लेना ताकि उनके साथ-साथ उसके बच्चों का भी ख्याल रख सके। डा. खरे की आंखें छलछला आईं यह सोचकर कि यह मर रही है फिर भी अपना दर्द भूल कर मेरी और बच्चों की चिन्ता इसे खाए जा रही है इसके आगे उनका दिमाग शून्य हो गया समझ ही नहीं आया कि क्या कहें बस उसके दोंनो हाथों को हाथ में लेकर आश्वासन में सिर झुका लिया और हाथों को पकड़े-पकड़े ही मिसेज खरे के प्राण-पखेरु उड़ गए। घर में हाहाकार मच गया बच्चे विलख-विलख कर रोने लगे ।रोते-विलखते बच्चों को देखकर डा. खरे के सब्र का बाँध टूटकर आँसुओं में बह निकला । वे यह सोच-सोच कर चिन्तित हो रहे थे कि अब इन बच्चों के लिए माँ कहाँ से लाऊँगा ।

तेरह दिन का कर्मकाण्ड निबटा कर डा. खरे अपने काम में वापस लौट आए और बच्चों को भी समझाबुझा कर हास्टल भेज दिया । जल्दी ही उनकी दिनचर्या नार्मल हो गई। वे अपना समय आफिस के काम में और ज्यादा गुजारने लगे और ज्यादा पीने भी लगे । इतने  बड़े बंगले में वे अकेले  कुछ नौकरों के साथ रहते थे ।  धीरे -धीरे उनकी उदासी कम होने लगी किन्तु  आवश्यकता से अधिक पीना जारी रहा । डा. खरे  का स्वाभाव हमेशा खुश रहने का ही था इसलिए वे अपनी प्रकृति के अनुसार जीने लगे।

शोध-कार्य में कई वैज्ञानिक उनके साथ  काम करते थे । उन्हीं में एक  डा.सायना भी थी जिसका व्यक्तित्व बहुत आकर्षक था। गोरी,लंबी छरहरे बदन की सहज ही मन मोहक थी और सबसे अच्छे  गुण ये थे कि वह खिलखिला कर  हँसती थी  और अपने काम में बहुत तेज थी । डा. खरे उससे काफी प्रभावित थे ।

डा. सायना को एक प्रतिभाशाली और अमीर् पति की तलाश थी वह  डा. खरे में वह सब गुण देख रही थी जो उसे अपने पति में चाहिए थे।आलीशन बंगला ,इम्पोर्टेड गाड़ी, आधा दर्जन नौकर-चाकर और उच्च पद पर आसीन  देखकर वह सोचती कि इससे अच्छा पति उसे कहाँ और कब मिलेगा इसलिए वह अपनी तरफ से डा. खरे के नजदीक जाने की कोशिश करने लगी । डा. खरे वैसे ही रसिक व विनोद प्रिय व्यक्ति थे अपने अकेलेपन से ऊब गए थे  और जब उन्होंने देखा कि सायना खुद उनमें रुचि दिखा रही है तो वे भी उसके साथ  में रुचि लेने लगे ।दोंनो अधिक से अधिक समय साथ बिताने लगे।

डा. खरे ने कभी शादी के लिए इसलिए नहीं सोचा कि बच्चों को कहीं सौतेली माँ  ठीक से न देखे तो उनके लिए यह कष्ट और भी असहनीय हो जाएगा ।

सायना यह अच्छी तरह जानती थी कि डा. खरे की कमजोरी उनके बच्चे हैं इसलिए वह बच्चों से मेलमिलाप बढ़ाने लगी । धीरे-धीरे बच्चों को भी उसका साथ अच्छा लगने लगा । डा. खरे यह देख कर खुश होते कि बच्चे सायना को पसन्द करते हैं। चूंकि सायना मुस्लिम थी इसलिए दिल में कुछ डर हमेशा रहता था लेकिन जब सायना ने स्वयं शादी का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने यह कहकर टाल दिया कि मैंने इस बारे में अभी कुछ सोचा नहीं । सायना को बाजी अपने हाथ से निकलते लगी  इसलिए बच्चों को खुश रखने की मुहिम और तेज कर दी ।  वह रोज बच्चों के साथ ज्यादा सेज्यादा  समय बिताने लगी कभी उन्हें घुमाने ले जाती कभी पिक्चर दिखाने और कभी होटल खाना खिलाने । बेचारे माँ के प्यार के लिए तरसे बच्चे यह बात समझ ही न सके कि यह सब दिखावा है । उन्हें सायना आंटी अच्छी लगने लगी ।

एक दिन मौका देखकर सायना ने बच्चों से पूछा कि `क्या उन्हें अपनी माँ की याद नहीं आती ‘।

बच्चे यह बात सुनकर बहुत उदास हो गए और बोले` हमें माँ की याद बहुत आती है लेकिन पापा कहते हैं माँ  अब वापस नहीं आ सकती ।फिर पापा तो हमें  माँ के जैसे ही प्यार करते हैं ‘।

सायना ने कहा कि `अगर मैं तुम्हारी माँ बन जाऊँ तो क्या वे उसे अपनी माँ  कहना पसन्द करेंगे’?

बच्चे बड़े खुश हो कर बोले-` सच में आप हमारी माँ बनेगी।सायना ने  `हाँ’ कहकर दोंनो बच्चों को गले लगा लिया ‘।

` बच्चे माँ के प्यार को तरस गए थे इसलिए  वे दोंनो सायना आंटी को माँ के रूप में  बनने के सपने देखने लगे’।

सायना ने मौके का फायदा उठा कर बच्चों से कहा कि `वे अपने पापा से जाकर कहें कि हमें माँ चाहिए ‘।

बच्चों ने जाकर वैसा ही कहा जैसा सायना आंटी ने उन्हें सिखाया था ।

डा. खरे ने बच्चों को समझाने की बहुत कोशिश की कि वह उनके लिए माँ नहीं ला सकते  लेकिन बच्चे कुछ सुनने को तैयार नहीं थे और ज़िद करने लगे कि `वे सायना आंटी से शादी करलें तो हमें माँ मिल जाएगी’।

डा. खरे ने बच्चों को यह कह कर टाल दिया कि सोचेगें। वे सोच विचार करने लगे कि सायना बच्चों से बड़ी हिल-मिल गई है ।बच्चे भी बहुत पसन्द करने लगे हैं और सच तो यह था कि सायना उन्हें भी  बहुत पसन्द थी । उसके सानिद्धय में उन्हें भी खुशी मिलती थी। बस  उन्हें चिन्ता थी तो यह कि सायना मुस्लिम है पता नहीं वह हमारे घर के माहौल में फिट बैठेगी या नहीं? हालांकि वह दकियानूसी नहीं थे पर वे अपने घर की संस्कृति को बनाए रखना चाहते थे ।

सायना को डा. खरे की दुविधा का अन्दाज़ा लग गया और उसने खुद अपनी तरफ से पहल की कि वह उनके धर्म के अनुसार चलेगी पर उसे पता था कि वह सिर्फ शादी करने के लिए इस झूठ का सहारा ले रही है। डा. खरे की जो रही सही दुविधा थी वह भी समाप्त हो गई फिर भी शादी करने से पहले  उन्होंने बच्चों से एक बार फिर से पूछ लिया और बच्चों  के हाँ कहने पर एक दिन दोनों ने  कोर्ट मैरिज कर ली।   एक शानदार रिसेप्शन अपने मित्रो,रिश्ते-नातेदारों और सहकर्मियों को दे दिया ।

डा.खरे और सायना खुशी-खुशी अपनी ज़िन्दगी जीने लगे।सायना तो सौन्दर्य की प्रतिमा थी ही। उसे देखकर किसी भी पुरुष की आह निकल जाती। डा. खरे भी उसके रूप सौन्दर्य के जाल में कैद हो चुके थे साथ ही  उसकी कार्यकुशलता के भी कायल थे। उनके साथ माडर्न   सोसाइटी में भी वह  मूव कर सकती थी। उनका  अक्सर विदेश काम के सिलसिले में आना-जाना होता था तो वे हमेशा सायना को साथ ले जाते । लगभग एक वर्ष  इसी तरह गुजर गया लेकिन एक दिन सायना ने डा. खरे के सामने अपनी इच्छा जाहिर की  कि वह माँ बनना चाहती है । डा. खरे को उसकी यह बात बड़ी अजीब लगी क्योंकि वे और बच्चे नहीं करना चाहते थे और यह बात सायना को पता थी फिर भी उसने यह बात क्यों कही?

उन्होंने सायना से कहा कि रेश्मा और रोमित तो हैं हमें और बच्चे नहीं चाहिए लेकिन सायना ने कहा कि हर स्त्री की दिली इच्छा होती है माँ बनने की औरउसका  स्त्रीत्व भी तभी पूर्ण होता है जब वह स्वयं माँ बने ।

डा. खरे  ने बहुत सोच विचार किया और इस निर्णय पर पहुँचे कि अगर वह माँ बनना चाहती है तो मैं उसे मना करके बेवजह तकलीफ क्यों दूँ? आर्थिक कमी भी नहीं है ।मैं उनका पालन पोषण करने में समर्थ हूँ ।उसकी इच्छा पूरी होने से वह और भी खुश रह सकेगी ।

एक वर्ष पूरा होते -होते सायना ने जुड़वाँ   बच्चों को जन्म दिया डा. खरे फूले न समाए कि चलो रेश्मा और रोमित को दो  भाई और मिल गए । उन्हें तब  क्या पता था कि ये बच्चे ही घर में क्लेश का कारण बनेंगे? जब नाम रखने की घड़ी आई तब डा. खरे अपने पसन्द का नाम रखना चाहते थे लेकिन सायना मुस्लिम नाम रखना चाहती थी।सायना ने अपने पति की एक न सुनी और उसने बच्चों का नाम ` इरफ़ान’और`इमरान’  रखा इतना ही नहीं अपने माँ के घर जाकर उसने उनका`खतना’ भी करवा दिया ।

डा. खरे को यह खुलेआम चुनौती थी कि अब वह उनकी एक बात भी  सुननेवाली नहीं है। घर में तनाव बढ़ने लगा । सायना का व्यवहार बदलने  लगा जब भी रेश्मा रोमित छुट्टियों में घर आते वे उनके साथ दुर्व्यवहार करती ।हमेशा किसी न किसी बात के लिए उन्हें डाँटती रहती ।बच्चे अपना दुख अपने पापा को बताते  और रो-रो कर बताते कि सायना आंटी हमें हर समय जलील करती रहती है  अब उन्हें घर आने का मन नहीं करता।डा. खरे खुद अपनी आंखों से यह सब देख रहे थे कि सायना अपना गुस्सा बच्चों पर निकाल रही है ।वे यह नहीं चाहते थे कि घर में और तनाव बढ़े इसलिए बच्चों को लेकर वे आफिस के गेस्ट हाउस में रहते और बच्चों को हर तरह खुश रखने की कोशिश करते जब बच्चे हास्टल चले जाते तब वे घर वापस आ जाते ।सायना और मि. खरे के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही थी।

सायना   वही करती जो उसके पति को तकलीफ देता । नौकरी छोड़ दी थी । उनका  ड्राइवर था मो. हसन ।बड़ा ही चालू किस्म का था। उसे यह अच्छी तरह पता था कि मेमसाहब  का साहब से नहीं बनती ।मौके की नज़ाकत का फायदा उठा कर वह सायना के बहुत करीब आ गया । हमेशा साहब की चुगली करके मेमसाहब को खुश करता रहता  वह सायना के इतने करीब हो गया कि उसकी हर ज़रूरत पूरी करने लगा। इस तरह सायना अपने पति मि. खरे से दूर होती गई। लेकिन एक दिन ड्राइवर से उसे पता चला कि उसके पति के पास सोने के भारी-भारी गहने हैं जो उनकी  पहली पत्नी के हैं ।

सायना का लालच बढ़ा और  उसने अपना रुख अपने पति कि ओर कुछ नरम कर दिया और वह उन्हें खुश करने में लग गई । डा. खरे भी कब तक अलग-थलग रहते इसलिए वे नार्मल हो गए ।वे पत्नी के इस अजीबो-गरीब परिवर्तन को समझ न पाए ।

सायना ने मौका देखकर एक  दिन बड़े प्यार से अपने पति से कहा `आपके पास जो सोने के  जेवरात हैं वे सब आप मुझे दे दें मैं उन्हें पहनूँगी और अच्छा रख-रखाव करूँगी’।

डा. खरे को जैसे  जोर का झटका लगा किन्तु शीघ्र ही संभलकर बोले `वे गहने तुम्हें नहीं मिल सकते वे रेश्मा और रोमित की बहू के लिए हैं। यदि तुम्हें गहने चाहिए तो नए खरीद लो मैं तुम्हें पैसे दे दूँगा।’

सायना ने अपना अंतिम अस्त्र फेंका ` क्या मैं आपकी कोई नहीं हूँ ,क्या आप मुझसे प्यार नहीं करते ‘?

डा. खरे ने उसे समझाते हुए कहा `प्यार करता हूँ लेकिन इन गहनों पर सिर्फ और सिर्फ रेशमा और रोमित का अधिकार है। बाकी सब में सबका अधिकार है। फिर मै तुम्हें पैसे तो दे रहा हूँ तुम नए गहने खरीद लो’।

सायना को गहने न मिलने का उतना दुख नहीं था जितना इस बात का दुख था कि उसने उसकी बात न मानकर उसके अहं को चोट पहुँचाई है और इसका प्रतिशोध वह लेकर रहेगी।

सायना घायल नागिन सी  फुंकारती हुई बोली कि ` इसी पल तुम्हें यह निश्चित करना होगा कि तुम मेरे साथ रहना चाहते हो या बच्चों के साथ?

डा. खरे गंभीर होकर बोले `तुम्हारे पास तो तुम्हारे बच्चे हैं पर इन बच्चों का तो कोई नहीं है इसलिए मैं इन बच्चों  के साथ ही रहना चाहता  हूँ।

सायना का  जब अंतिम अस्त्र भी निरस्त्र हो गया तब  उसने बिना सोचे समझे ताब में आकर  तलाक के कागजात भेज दिए।  शीघ्र ही दोंनो  का तलाक भी हो गया। तलाक के पश्चात  डा.सायना अपने बच्चों को लेकर  सऊदी अरब  नौकरी के सिलसिले में चली गई।

डा.खरे ने रेश्मा और रोमित को अमेरिका में  पढ़ाया -लिखाया और अब तो उनकी शादी भी हो गई है और वे अमेरिका में ही बस गए हैं । डा. खरे आज भी अपने बंगले में अकेले रहते हैं अपने बच्चों और दिवंगत पत्नी की यादों के साथ। एक दिन वे हमारे घर खाने पर आए थे तब  वे देर तक अपनी पहली पत्नी और बच्चों की बातें करते रहे ।

बातों-बातों में मैंने यूँ ही  उनसे पूछ लिया `क्या आपने सायना के बच्चों के लिए  भी अपनी वसीयत में जगह दी है’?

उन्होंने तुरन्त कहा `हाँ,क्यों नहीं ? वे भी मेरे ही बच्चे हैं।मैंने सायना से कहा भी था कि बच्चों की परवरिश या पढ़ाई -लिखाई के लिए अगर पैसों की जरूरत पड़े तो मुझे जरूर बताए’।

उन्होंने यह भी बताया कि ` सायना ने अपने बच्चों को उनके पिता के बारे में सच बताया है । सायना अपने  बच्चों के साथ जब  आफिसियल टूर पर यहाँ आई थी तब उसने अपने बच्चों से  मुझे  फोन करवाया था।

`जैसे ही मैंने फोन  उठाया और कहा कौन बोल रहा है ?

उधर से बच्चे की आवाज आई `क्या मैं डा. खरे से बात कर सकता हूँ।

मैंने कहा `जी,मैं  बोल रहा हूँ। आप कौन हो?

उधर से आवाज आई` आपका बेटा’ ।

तब मैं आश्चर्यचकित होकर बोला ` मेरा बेटा’!

उधर से  फिर से यही जवाब मिला `जी आपका बेटा  इरफ़ान बोल रहा हूँ । हम आपसे मिलना चाहते हैं।

तब मैंने  पूछा कहाँ पर हो? मैं लेने आता हूँ।

बच्चों से मिलकर  मुझे बहुत अच्छा लगा ।वे भी मुझसे ऐसे लिपट गए जैसे वे मुझे सदियों से जानते हों। मैं सायना से पूछ कर उन्हें घर लेकर आया।   दिन भर बच्चों के साथ गुजारा शाम के समय उन्हें उनकी माँ के पास छोड़ आया ।

मैंने भी कहा आपने बिल्कुल सही किया ।

उन्होंने कहा ` पति-पत्नी के झगड़े में बच्चों का क्या कसूर? उनका  हक़ तो उन्हें मिलना  ही चाहिए’।

उनका इतना सुलझा हुआ उत्तर सुनकर मैं सोचने लेगी कि `क्या कोई  पिता  भी इतनी ममता रख  सकता  है? जग की कहावत तो  कुछ और ही कहती है` माँ दूसरी हुई तो पिता तीसरा बन जाता है’ लेकिन इस पिता की ममता देखकर मैं नतमस्तक हूँ।