May 4, 2008 at 4:38 pm (गीत)
Tags: यूँ न मिटाईए
अजन्मी भ्रूणी बेटी को यूँ न मिटाईए।
मुझे मारर्ने से पहले कुछ तो विचारिए॥
बेटी का प्यार है अपार माँ-बाप के लिए,
राखी के तन्तुओं से बंधा प्यार भाई के लिए।
हर रिश्ते की धुरी में बेटी को पाईए।
संतुलन बिगड़ रहा बेटी को खोने से,
जुल्म और भी बढ़ेगें बेटी के नहीं होने से।
सृष्टि के संतुलन को कुछ तो संभालिए।
करता है अंग-भंग जब चाकू से डाक्टर,
डर-डर के चीखती है माँ-माँ पुकार कर,
करती है आर्तनाद पापा बचाईए ।
मुझसे हुई ख़ता क्या जो माँ रूठ तू गई,
मिलने से पहले ही तू मुझसे दूर हो गई,
अपने ही प्रतिरूप को यूँ न संहारिए।
डा. रमा द्वि्वेदी
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May 2, 2008 at 5:07 pm (क्षणिकाएं)
Tags: उसके जैसे, क्षणिका
तुम उसके जैसे,
बनने की कोशिश,
कभी मत करना,
क्यों कि तुम,
वो नहीं बन सकते,
लेकिन तुम बहुत कुछ,
बन सकते हो,
जो वे नहीं बन सके।
डा. रमा द्विवेदी
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April 30, 2008 at 5:23 pm (क्षणिकाएं)
Tags: क्षणिका
चिड़ियों की ऊँची और ऊँची,
उड़ने की कोशिश भी,
आकाश को छू नहीं पातीं,
पर इसका अर्थ,
यह कतई नहीं,
कि वे उड़ना छोड़ दें।
डा. रमा द्वि्वेदी
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April 23, 2008 at 4:44 pm (क्षणिकाएं)
Tags: दो क्षणिकाएँ
१- मिट्टी का मूल्य
मिट्टी का मूल्य,
तु्म तब समझोगे ,
जब मृत-तन को,
मिट्टी में ही बदल देगी,
यह मिट्टी ।
२- आकाश
आकाश का असीमित फलक,
हमें यह बताता है कि-
मंजिलों की कोई सीमा नहीं होती,
पर हर एक उड़ने वाले की,
क्षमता तो सीमित ही होती है।
डा. रमा द्विवेदी
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April 22, 2008 at 11:26 am (संवेदना की अनुभूतिय)
Tags: जहर की सुई
माना कि सौन्दर्य के प्रति,
स्त्री का विशेष लगाब,
सदियों से रहा है,
आधुनिक युग में यह सौन्दर्य-प्रेम,
बेतहासा,बेलगाम बढ़ा है
सौब्दर्य बढ़ाने की तमाम तकनीकें,
पीछे छूट गई हैं।
अब कमसिन दिखने की,
एक नई जहर की सुई ईजाद हुई है,
जिसके के लगवाने से चेहरे की झुर्रियां
कुछ हफ़्ते- महीने के लिए
गायब हो जाती हैं,
और सौन्दर्य में चार चाँद लग जाते हैं,
और फ़िर त्वचा,
पहले से भी ज्यादा,
कान्तिहीन हो जाती है,
फ़िर जहर की सुई लेनी पड़ती है,
विषकन्याएँ ऐसे ही तैयार की जाती थीं,
फ़र्क बस इतना है,
कि रूप- सौन्दर्य बढ़ाने के लिए
चेहरे पर जहर की सुई दी जाती है,
और विष-कन्या को जहर खिलाया जाता था,
यहाँ रूप-सौन्दर्य देखकर,
लोगों के होश खो जाते हैं,
और वहाँ विष-कन्या के काटने मात्र से
कभी होश में आते नहीं।
डा. रमा द्विवेदी
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April 18, 2008 at 5:32 pm (गीत)
Tags: करो नवसृजन
दीप मन के जलाओ करो नवसृजन,
दूर तम को भगाओ करो नवसृजन।
भाव उगते नहीं, शब्द मिलते नहीं,
मन का सागर खंगालो करो नवसृजन।
कण-कण यहाँ सहमा-सहमा लगे,
स्नेह-गंगा बहाओ करो नवसृजन ।
प्रदूषित हवा और प्रदूषित है जल,
तरु-सरोवर बचाओ करो नवसृजन।
सभ्यता-संस्कृति संक्रमित हो रही,
पीढ़ियों को बचाओ करो नवसृजन ।
कामनाएँ हों पूरन भगीरथ बनो,
स्वर्ग भूतल पे लाओ करो नवसृजन।
गुनगुनाती हवाएँ फिर से बहें,
गीत ऐसा सुनाओ करो नवसृजन।
बिन तराशे कोई मूर्ति बनती नहीं,
पत्थरों को तराशो करो नवसृजन।
डा. रमा द्विवेदी
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April 14, 2008 at 5:45 pm (गीत)
Tags: जीवन का यह चलन
पवन चले सनन-सनन मेरे देश में,
पायल बजे छनन-छनन मेरे देश में।
शहनाइयाँ कहीं बज रहीं,
ड़ोलियाँ कहीं सज रहीं,
कंगना करें खनन-खनन मेरे देश में…
पवन चले सनन-सनन मेरे देश में।
बगिया कहीं महक रही,
कहीं तितलियाँ बहक रहीं,
भौरे फिरैं चमन-चमन मेरे देश में..
पवन चले सनन-सनन मेरे देश में।
कहीं बदलियाँ बरस रहीं,
कहीं सजनियाँ तरस रहीं,
आँसू गिरैं घनन-घनन मेरे देश में…
पवन चले सनन-सनन मेरे देश में।
हिमगिरि कहीं विराट है,
सागर कहीं विशाल है,
नदियाँ बहैं मगन-मगन मेरे देश में..
पवन चले सनन-सनन मेरे देश में।
कहीं योगी तप मेम लीन है,
कहीं भोगी रस-विलीन है,
जीवन का यह चलन-चलन है नेरे देश में..
पवन चले सनन-सनन मेरे देश में।
डा. रमा द्विवेदी
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April 13, 2008 at 5:53 pm (मुक्तक)
Tags: मुक्तक
१- जरा-मरण के बीच में
दूरी है इक साँस की।
साँस रुकी तो मृत्यु मिलेगी,
मृत्यु रुकी तो ज़िन्दगी॥
२- ज़िन्दगी के रंगों में
इक रंग मुझको भा गया।
जीते-जीते ज़िन्दगी पर ,
प्यार मुझको आ गया॥
डा. रमा द्विवेदी
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April 7, 2008 at 3:31 pm (शुभकामनाएं)
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March 29, 2008 at 5:54 am (संवेदना की अनुभूतिय)
हे सृजनकर्ता,
तूने यह कैसी दुनिया बनाई,
आदमी, आदमी को खा रहा है,
जन्मदाता भी भक्षक बन रहा है.
मानवीय प्रकृति के समीकरण,
बड़ी तेजी से बदल रहे है,
संवेदनशीलता नए सांचे में ढ़ल रही है,
कलियों को खिलने से पहले ही,
मसला कुचला जा रहा है,
दहशत ही दहशत,
आंख के आंसू सूख चुके हैं,
वाणी मूक है, कान बहरे हो गए हैं,
किससे फ़रियाद करें?
जहां जाएं खूंख्वार भेड़िए ,
मांस खाने के लिए घात लगाए बैठे हैं,
शायद इसलिए ही वह,
कई नर्कों से बचने के लिए,
एक ही नर्क भोगने के लिए विवश है।
डा. रमा द्विवेदी
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